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चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार पर विवाद: नियुक्ति से SIR तक उठे सवाल

चुनाव आयोग विवाद में ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के आरोप, SIR की विसंगतियां और आयोग का जवाब जानें। नियुक्ति कानून और मतदाता सूची से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में हैं।

चुनाव आयोग विवाद और मतदाता सूची के SIR पर संपादकीय चित्र

चुनाव आयोग विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गहराया है। विपक्ष ने आयोग पर एकतरफा ढंग से काम करने और मतदाता सूची में गड़बड़ियों के आरोप लगाए हैं। चुनाव आयोग ने कहा है कि बहु-सदस्यीय संस्था में असहमति स्वाभाविक है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं। अब नियुक्ति कानून और SIR से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में हैं।

नियुक्ति प्रक्रिया पर पुराना विवाद

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि संसद के कानून बनाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर हो। दिसंबर 2023 में संसद ने नया नियुक्ति कानून पारित किया। इसमें चयन समिति से CJI को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। विपक्ष ने इसे कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ाने वाला कदम बताया।

डॉ. जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसी दौरान चुनाव आयुक्त अनूप चंद्र पांडे फरवरी 2024 में सेवानिवृत्त हुए और अरुण गोयल ने 9 मार्च को इस्तीफा दिया। 14 मार्च 2024 को प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी की समिति की सिफारिश पर ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए। चौधरी ने असहमति जताते हुए कहा था कि उन्हें संक्षिप्त सूची के नाम बैठक से केवल 10 मिनट पहले दिए गए। राजीव कुमार का कार्यकाल पूरा होने के बाद ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला।

विपक्ष और आयोग के बीच बढ़ता टकराव

जुलाई 2025 में बिहार की मतदाता सूची के SIR पर आयोग की बैठक के बाद RJD सांसद मनोज झा ने आरोप लगाया कि CEC में विपक्ष की बात सुनने की क्षमता और आदत नहीं है। अगस्त में अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर उनसे सात दिन के भीतर हलफनामा देने या देश से माफी मांगने को कहा।

ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर विपक्ष के आरोपों के बीच SIR और नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।
ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर विपक्ष के आरोपों के बीच SIR और नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।

8 अप्रैल 2026 को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिम बंगाल के चुनाव अधिकारियों को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नौ पत्रों पर CEC से मुलाकात की। सात मिनट चली बैठक के बाद TMC नेताओं ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने उन्हें “गेट लॉस्ट” कहा, दूसरे आयुक्तों को बोलने से रोका और पार्टी का चुनाव चिह्न छीनने की धमकी दी। आयोग ने कहा कि डेरेक ओ’ब्रायन बैठक में चिल्ला रहे थे और CEC ने केवल मर्यादा बनाए रखने को कहा था। आयोग ने अपनी प्रतिक्रिया को “स्ट्रेट टॉक” बताया और धमकी के आरोपों को निराधार कहा।

जून में मध्य प्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन खारिज होने के विवाद के बाद कांग्रेस नेताओं को पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 का हवाला देकर आयोग कार्यालय के बाहर रोक दिया। धरने के बाद वरिष्ठ नेताओं को अंदर जाने दिया गया। उसी महीने पवन खेड़ा के नेतृत्व में उत्तराखंड का कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल SIR और फॉर्म-7 की विसंगतियों पर आयोग से मिलने पहुंचा। कांग्रेस के अनुसार, एक सप्ताह इंतजार के बाद भी उन्हें भीतर नहीं बुलाया गया और ज्ञापन लेने के लिए UDC स्तर के कर्मचारी को बाहर भेजा गया।

आयोग के भीतर असहमति के आरोप

सितंबर 2026 में इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में फाइलों के हवाले से कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाता सूची के नियंत्रण, फॉर्म-6 में बदलाव, डेटाबेस के केंद्रीकरण और कार्य आवंटन पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।

रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2026 में जोशी ने कहा था कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में औपचारिक संशोधन के बिना फॉर्म-6 का प्रारूप नहीं बदला जा सकता। संधू ने भी इस राय का समर्थन किया और बदलावों को “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए वापस लेने की मांग की। दोनों आयुक्तों ने डेटाबेस को राज्यों से दिल्ली में केंद्रीकृत करने पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इससे राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों की प्रणाली तक स्वतंत्र पहुंच प्रभावित हुई। उन्होंने कार्य आवंटन और आईटी ढांचे में बदलावों को लेकर कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा।

रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी दर्ज है। स्थानीय निर्वाचक निबंधन अधिकारी ने 97 मतदाताओं को पात्र पाया था, लेकिन केंद्रीय सॉफ्टवेयर में ‘रोलबैक’ की सुविधा न होने से उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सका। इससे सवाल उठा कि वैधानिक अधिकार रखने वाले स्थानीय अधिकारी का आदेश सॉफ्टवेयर की सीमा के कारण कैसे लागू नहीं हो पाया।

इन आपत्तियों पर आयोग ने कहा कि विचार-विमर्श में आयुक्तों की राय अलग हो सकती है, लेकिन पिछले एक वर्ष के सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। विपक्ष का सवाल है कि फाइलों में दर्ज 14 आपत्तियों के बावजूद फैसलों को सर्वसम्मत कैसे बताया गया।

सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति कानून और SIR की चुनौती

23 सितंबर 2026 को नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ ने विभाजित फैसला दिया। पीठ ने मामले को संविधान पीठ गठित करने के लिए CJI के समक्ष रखने को कहा।

6 अक्टूबर को करीब 240 विपक्षी सांसदों ने निर्वाचन आयोग कार्यालय की ओर मार्च किया। पुलिस ने उन्हें रोका तो सांसद सड़क पर बैठ गए। आयोग ने उसी शाम कहा कि शाम चार बजे तक किसी दल ने लिखित मुलाकात का समय नहीं मांगा था। आयोग के मुताबिक, उसने ज्ञापन लेने के लिए अपना वरिष्ठ अधिकारी संसद भवन एनेक्सी भेजने की पेशकश की थी, जबकि विपक्षी सांसद वहीं आयोग से मिलना चाहते थे। आयोग ने कहा कि तय प्रोटोकॉल के अनुसार ऐसी बैठक निर्वाचन सदन में होनी चाहिए।

11 अक्टूबर को गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिश पर दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया और रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा CBD ग्राउंड को नए स्थल अधिसूचित किया। उसी रात CJI सूर्या कांत ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे से निजी मुलाकात से इनकार किया। उन्होंने कहा कि मामला विचाराधीन है और 13 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

12 अक्टूबर को राहुल गांधी समेत 11 विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त रिट याचिका दायर की। याचिका में SIR की विसंगतियों, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने पर रोक और CEC को हटाने की मांग की गई।

विपक्ष के आरोप और सरकार का जवाब

राहुल गांधी और INDIA गठबंधन का आरोप है कि SIR के दौरान लक्षित तरीके से पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और पारदर्शी ऑडिट के बिना मतदाता सूची में बदलाव हो रहे हैं। विपक्ष आयोग को “वन-मैन आर्मी” की तरह चलाने और दूसरे आयुक्तों को बोलने का मौका न देने का भी आरोप लगाता है।

12 अक्टूबर को राहुल गांधी ने CEC से इस्तीफा देकर “टर्न अप्रूवर” बनने की मांग की। उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार के 200 से अधिक अधिकारी विपक्ष से जानकारी साझा कर रहे हैं और दिल्ली में 20,000 से 30,000 पुलिस तथा अर्धसैनिक बल तैनात किए गए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिसकर्मियों का एक हिस्सा प्रदर्शनकारियों की भावना का समर्थन करता है। ये राहुल गांधी के दावे हैं।

BJP ने विपक्ष के प्रदर्शनों को चुनावी हार से ध्यान भटकाने वाला “शुद्ध नाटक” बताया और विपक्षी नेतृत्व को “विचार शून्य” कहा। दूसरी ओर, AISA, CJP और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से हटाने का विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने वकीलों की हिरासत और इंटरनेट बंदी पर सुनवाई की मांग की। CJI ने कहा कि प्रदर्शन से अदालत का कामकाज बाधित नहीं होना चाहिए। दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के वकीलों ने भी काली पट्टी बांधकर विरोध जताया।

चुनाव आयोग विवाद: आगे किन सवालों पर नजर रहेगी

विवाद के केंद्र में तीन प्रश्न हैं: नियुक्ति समिति से CJI को हटाने वाले 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता क्या है; आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और उसके सर्वसम्मति के दावे में तालमेल कैसे बैठता है; और मतदाता सूची में संशोधन तथा तकनीकी व्यवस्था के कारण पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित तो नहीं हुए। इन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आयोग की निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता आगे की दिशा तय करेगी।

लेखक

Rakesh Kumar

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