मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है। चुनाव आयोग के कामकाज और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठे सवालों के बीच विपक्षी दलों की ओर से उनके इस्तीफे की मांग की जा रही है।
इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। पार्टी ने कहा है कि अगर वह शनिवार तक पद से इस्तीफा नहीं देते हैं तो 2 अक्टूबर से देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आंदोलन की शुरुआत मुंबई से करने की बात कही है।
विवाद की शुरुआत उस रिपोर्ट के बाद हुई जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और कामकाज को लेकर आपत्तियां उठाए जाने की बात कही गई थी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले करीब 10 महीनों में कई मौकों पर SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में ऐसे 14 मौकों का भी जिक्र किया गया है।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन खबरों के जवाब में कहा है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग का कहना है कि पिछले एक साल में लिए गए अंतिम फैसले, जिनमें SIR से जुड़े फैसले भी शामिल हैं, सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
अब सवाल यह है कि अगर किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस्तीफे की मांग उठती है तो क्या उन्हें सीधे पद से हटाया जा सकता है? और अगर नहीं, तो संविधान में इसकी क्या प्रक्रिया है?
चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है?
भारत के चुनाव आयोग का संवैधानिक आधार संविधान के अनुच्छेद 324 में है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मौजूदा कानून के तहत राष्ट्रपति करते हैं।
2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित नया कानून बनाया था। इसके तहत नियुक्ति के लिए एक चयन समिति की व्यवस्था है।
इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त का कार्यकाल अधिकतम छह साल या 65 वर्ष की आयु तक होता है।
इस पद पर नियुक्ति के लिए अधिकारी के पास केंद्र सरकार में सचिव स्तर के पद का अनुभव और चुनावों के प्रबंधन एवं संचालन से जुड़ा ज्ञान और अनुभव होना जरूरी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त में क्या फर्क है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के सदस्य होते हैं, लेकिन दोनों की संवैधानिक सुरक्षा एक जैसी नहीं है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया विशेष रूप से कठिन रखी गई है। इसका मकसद चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से बचाना है।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है। 2023 के कानून में भी यही व्यवस्था रखी गई है।
वहीं अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश जरूरी होती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए क्या आरोप साबित होने जरूरी हैं?
मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल किसी राजनीतिक दल की मांग या संसद में सामान्य प्रस्ताव के आधार पर नहीं हटाया जा सकता।
संविधान में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए जिन आधारों का इस्तेमाल किया जाता है, वही व्यवस्था मुख्य चुनाव आयुक्त पर भी लागू होती है।
इनमें मुख्य रूप से दो आधार हैं:
- साबित हुआ कदाचार
- अक्षमता
कदाचार में भ्रष्ट आचरण या पद के दुरुपयोग जैसे मामले शामिल हो सकते हैं। अक्षमता का मतलब ऐसी स्थिति से है जिसमें अधिकारी अपने संवैधानिक दायित्वों को निभाने में सक्षम न हो।
इसलिए किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सिर्फ राजनीतिक आरोप लग जाना अपने आप में पद से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं होता। निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।
संसद में कैसे शुरू होती है हटाने की प्रक्रिया?
अगर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करनी हो तो संसद के किसी सदन में प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है।
इस प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कदाचार या अक्षमता के स्पष्ट आरोप होने चाहिए।
प्रस्ताव को स्वीकार कराने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है।
इसके बाद प्रस्ताव स्वीकार होने पर आरोपों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच की जाती है। यानी केवल सांसदों के हस्ताक्षर हो जाने से मुख्य चुनाव आयुक्त पद से नहीं हट जाते।
जांच में आरोपों और उनसे जुड़े सबूतों को देखा जाता है। इसके बाद हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी होता है।
दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति की ओर से हटाने का आदेश जारी किया जाता है।
क्या ज्ञानेश कुमार को अभी सीधे हटाया जा सकता है?
अभी जो राजनीतिक मांगें सामने आई हैं, उनमें ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और उन्हें हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की बात शामिल है।
इस्तीफा देना और संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए पद से हटाया जाना दो अलग चीजें हैं।
अगर कोई मुख्य चुनाव आयुक्त खुद इस्तीफा दे देता है तो स्थिति अलग होगी। लेकिन अगर वह इस्तीफा नहीं देते और उन्हें पद से हटाने की कोशिश होती है तो संविधान में तय प्रक्रिया का पालन करना होगा।
इसलिए किसी राजनीतिक दल का अल्टीमेटम अपने आप मुख्य चुनाव आयुक्त का पद समाप्त नहीं करता।
SIR को लेकर क्या है विवाद?
मौजूदा विवाद का एक बड़ा हिस्सा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़ा है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR तथा मतदाता सूची से संबंधित कुछ फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग ने कहा है कि आंतरिक स्तर पर अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना संस्था की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
इसलिए फिलहाल इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग दावे सामने हैं। एक तरफ रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र है, जबकि चुनाव आयोग अंतिम फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बता रहा है।
CJP ने क्या कहा है?
कॉकरोच जनता पार्टी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए समयसीमा तय की है।
पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा है कि अगर ज्ञानेश कुमार शनिवार तक इस्तीफा नहीं देते हैं तो 2 अक्टूबर से मुंबई से देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा और इसे दूसरे शहरों तक ले जाया जाएगा।
पार्टी ने SIR को लेकर भी कई मांगें रखी हैं। इनमें आगामी चुनावों को रोकने और SIR से संबंधित प्रक्रिया में बदलाव जैसी मांगें शामिल हैं। ये राजनीतिक दल की मांगें हैं, जिन पर संबंधित संस्थाओं की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रिया हो सकती है।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में दो चीजों पर नजर रहेगी। पहली, क्या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की ओर से हटाने का कोई नया प्रस्ताव संसद में आगे बढ़ता है। दूसरी, SIR और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर उठे सवालों पर आगे क्या कार्रवाई होती है।
कानूनी तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया काफी लंबी और विशेष संवैधानिक प्रक्रिया है। इसलिए इस्तीफे की राजनीतिक मांग और वास्तव में पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है।
फिलहाल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और विरोध प्रदर्शन जारी हैं, जबकि चुनाव आयोग अपनी ओर से अंतिम फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बता रहा है।