नई दिल्ली: देश की प्रमुख यूनिवर्सिटी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियों और वैचारिक बहस का केंद्र बन गई है। इस बार विवादों के केंद्र में हैं ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और JNU की पीएचडी स्कॉलर Neha Bora। जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए तथाकथित ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ से लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियोज तक, Neha Bora के भाषणों और रुख को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
आरोप लग रहे हैं कि छात्र राजनीति के नाम पर देशविरोधी ताकतों का समर्थन किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि यह अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला और Neha Bora से जुड़े वे कौन-से विवाद हैं जिन पर देश भर में बहस छिड़ गई है।

Neha Bora का JNU से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर
Neha Bora, जो जेएनयू में पीएचडी स्कॉलर होने के साथ-साथ एक थिएटर आर्टिस्ट भी हैं, लंबे समय से वामपंथी छात्र संगठन AISA (All India Students Association) से जुड़ी हुई हैं। AISA को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी CPI(ML) की छात्र इकाई माना जाता है।
हाल ही में Neha Boraको AISA का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था, जिसके बाद से वे राष्ट्रीय स्तर पर छात्र आंदोलन का चेहरा बनकर उभरी हैं। हालांकि, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान उनके कुछ बयानों ने उन्हें बड़े विवाद के घेरे में ला खड़ा किया है।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर स्टैंड: आखिर क्यों उठे सवाल?
Neha Bora पर सबसे बड़ा आरोप यह लग रहा है कि वे दिल्ली दंगों की साजिश के मुख्य आरोपियों—उमर खालिद और शरजील इमाम—को ‘मासूम छात्र’ बताकर उनकी रिहाई की मांग करती हैं।
- शरजील इमाम का बयान: शरजील इमाम वही व्यक्ति है जिसका चिकन-नेक (Chicken’s Neck) कॉरिडोर का उपयोग कर पूर्वोत्तर भारत को बाकी देश से काटने की बात करने वाला वीडियो पूरे देश में देखा गया था।
- Neha Bora का रुख: आलोचकों का कहना है कि जो व्यक्ति खुलेआम भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है, उसे छात्र अधिकार के नाम पर बचाना सीधे तौर पर देशद्रोह की सीमा को छूने जैसा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिक मामलों पर दोहरा रवैया?
Neha Bora के हालिया बयानों और सोशल मीडिया एक्टिविटी पर आलोचकों ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
(क) ऑपरेशन सिंदूर और संभल हिंसा पर बयान
जब भारतीय सेना ने पीओके और पाकिस्तान में आतंकवादियों के ठिकानों पर कड़ा प्रहार किया (ऑपरेशन सिंदूर), तब Neha Bora ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए थे। वहीं उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा के मामले में, जहां जनसांख्यिकी बदलाव और सुनियोजित साजिश की रिपोर्ट्स सामने आई थीं, वहां भी नेहा बोरा का रुख कार्रवाई करने वाले प्रशासन के खिलाफ दिखाई दिया।
(ख) अंतरराष्ट्रीय मामलों पर सक्रियता, बांग्लादेशी हिंदुओं पर चुप्पी
Neha Bora का एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल गाजा और फ्री पैलेस्टाइन (Free Palestine) की पोस्ट्स से भरा पड़ा है। वे इजराइल द्वारा की जा रही कार्रवाई को ‘नरसंहार’ बताकर निंदा करती हैं। लेकिन जब पड़ोसी देश बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों (हिंदुओं) पर अत्याचार, मंदिरों में तोड़ाफोड़ी, बलात्कार और जबरन धर्मांतरण की खबरें आती हैं, तो उनके इस ‘चुनिंदा दर्द’ (Selective Human Rights) पर सवाल उठते हैं।
(ग) लव जिहाद और ब्राह्मणवाद पर विचार
- लव जिहाद: जब लव जिहाद जैसे संवेदनशील और गंभीर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा होती है, तो वे इसे गैर-ज़रूरी बताकर टाल देती हैं।
- जातिगत बयान: Neha Bora ने बार-बार ब्राह्मणवाद को समाज में हर तरह के भेदभाव की जड़ बताया है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर जातिवाद फैलाने के आरोप लगाए हैं। आलोचकों का कहना है कि वे आरएसएस द्वारा आपदाओं और समाजसेवा में किए जाने वाले लाखों कार्यों पर पूरी तरह चुप्पी साध लेती हैं।
अनशन और वायरल डांस वीडियो: मेडिकल मिरेकल या पब्लिसिटी?
Neha Bora से जुड़ा सबसे ताजा विवाद उनके अनशन और उसके तुरंत बाद सामने आए डांस वीडियो को लेकर है।
- 23 दिन का अनशन: मांगों को लेकर Neha Bora ने 23 दिनों तक अनशन किया था, जिसके बाद उनके वजन घटने और व्हीलचेयर पर आने की तस्वीरें मीडिया में आई थीं।
- वायरल डांस वीडियो: अनशन खत्म होने और पद से इस्तीफे के बाद Neha Bora का एक डांस वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया: वीडियो देखने के बाद नेटिजन्स सवाल उठा रहे हैं कि जो व्यक्ति 23 दिनों से अनशन पर था और व्हीलचेयर का इस्तेमाल कर रहा था, वह अचानक इतनी ऊर्जा के साथ कैसे डांस कर सकता है? क्या यह वास्तव में कोई ‘मेडिकल मिरेकल’ था या सिर्फ एक राजनीतिक नाटक?
‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की विचारधारा का विस्तार?
Neha Bora को प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय का प्रशंसक माना जाता है, जो खुद कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने से इनकार कर चुकी हैं। JNU में कन्हैया कुमार और उमर खालिद के दौर के बाद, Neha Bora को उसी विचारधारा और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। अतीत में भी पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ने, सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने और पुलिस अधिकारियों पर हमले के आरोपों में उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है।
निष्कर्ष: छात्र राजनीति या वैचारिक एजेंडा?
भारत में छात्र आंदोलनों का एक समृद्ध इतिहास रहा है, जिसने देश को कई बड़े नेता दिए हैं। लेकिन जब छात्र राजनीति का दायरा शिक्षा, हॉस्टल फैसिलिटी और फीस वृद्धि से हटकर देश की सीमाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रविरोधी तत्वों की रिहाई तक पहुंच जाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
Neha Bora का यह मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई यह ‘क्रांतिकारी छात्र राजनीति’ है या फिर वामपंथी एजेंडे के तहत देश की एकता को कमजोर करने की एक सोची-समझी कोशिश?