तत्काल टिकट के लिए रात भर लाइन में खड़े रहना और सुबह खाली हाथ लौट जाना, यह कहानी लाखों यात्रियों की है। अब रेलवे के सोनपुर मंडल ने इसका तोड़ निकाला है, जिसका नाम है क्यू मित्र।
क्या है क्यू मित्र सिस्टम?
यह एक डिजिटल टोकन सिस्टम है, जिसका पहला ट्रायल बिहार के बेगूसराय स्टेशन पर शुरू हुआ। यात्री को अब काउंटर की लाइन में नहीं लगना है। उसे स्टेशन पर लगी किओस्क मशीन से अपना टोकन लेना है।
टोकन कैसे मिलता है?
- मशीन पर आधार नंबर और मोबाइल नंबर डालें।
- मोबाइल पर आए ओटीपी को दर्ज करें।
- कैमरा आपका चेहरा स्कैन करके आधार के डाटा से मिलाता है।
- मिलान होने पर फोटो, क्रम संख्या और क्यूआर कोड वाला टोकन मिल जाता है।
दलालों पर कैसे लगेगी लगाम?
एक आधार और एक मोबाइल नंबर से 24 घंटे में सिर्फ एक टोकन बन सकता है। यानी दलाल को हर टिकट के लिए अलग असली इंसान और उसका असली चेहरा लाना होगा। इससे उनकी लागत और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।
काउंटर पर भी कड़ाई है। क्लर्क को सिर्फ वही टोकन दिखेगा जिसकी बारी है। टिकट तभी छपेगा जब टोकन स्कैन होगा और कैमरे से चेहरा दोबारा मिलेगा। सिस्टम बिना इंटरनेट के भी टोकन बना सकता है, इसलिए “सर्वर डाउन” का बहाना नहीं चलेगा।
ट्रायल के नतीजे
अधिकारियों के मुताबिक पिछले 15 से 20 दिनों में स्टेशनों पर धक्का-मुक्की और झगड़ों में करीब 80 प्रतिशत की कमी आई है। अब अयोध्या और टाटानगर में भी इसे आजमाया जा रहा है। टाटानगर में इसे मोबाइल ऐप से जोड़ने की तैयारी है, ताकि घर बैठे पता चल सके कि कौन सा टोकन चल रहा है।
अभी भी हैं तीन चुनौतियां
- दलाल असली लोगों को खड़ा करके कमीशन वसूल सकते हैं।
- देश के हजारों स्टेशनों पर मशीनें चालू रखना आसान नहीं होगा।
- ग्रामीण और बुजुर्ग यात्रियों के लिए फेस स्कैनिंग समझना मुश्किल हो सकता है।
इसके लिए सिस्टम को तमिल, तेलुगु, पंजाबी और बंगाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में रखा गया है और स्टेशनों पर रेल मित्र तैनात किए जा रहे हैं।
अगर यह सिस्टम ईमानदारी से पूरे देश में लागू हुआ, तो कन्फर्म टिकट के लिए किसी को रात काली नहीं करनी पड़ेगी। असली परीक्षा यही होगी कि यह आम यात्री के लिए कितना आसान साबित होता है।
आपकी क्या राय है? क्या फेस स्कैनिंग से रेलवे भ्रष्टाचार-मुक्त बन सकेगा? कमेंट में बताएं।

