
नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर शनिवार को एक बार फिर युवाओं की आवाज का केंद्र बन गया। सुबह से ही छात्र, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थी, अभिभावक, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के लोग यहां जुटने लगे। प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रियाओं में कथित देरी, परीक्षा अनियमितताएं और जवाबदेही की मांग रहा।
जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, जंतर-मंतर पर भीड़ बढ़ती चली गई। हाथों में तिरंगा, संविधान की प्रतियां, डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी की तस्वीरें लिए युवा नारे लगा रहे थे। लेकिन इस प्रदर्शन की सबसे भावुक तस्वीर एक 83 वर्षीय बुजुर्ग महिला की रही, जो हजारों युवाओं के बीच खड़ी दिखाई दीं।
83 वर्षीय महिला ने जीत लिया लोगों का दिल
जब उनसे पूछा गया कि वह छात्रों के इस प्रदर्शन में क्यों आई हैं, तो उनका जवाब सुनकर आसपास खड़े लोग भी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि उनके बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, लेकिन उन्हें देश के युवाओं और अपने पोते-पोतियों के भविष्य की चिंता है।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये सभी हमारे बच्चे हैं।”
उनकी यह बात कुछ ही मिनटों में प्रदर्शन स्थल पर चर्चा का विषय बन गई। कई युवाओं ने कहा कि यही भावना इस आंदोलन की असली ताकत है।
सुबह से जुटने लगी भीड़, सुरक्षा के कड़े इंतजाम
सुबह करीब 11 बजे तक जंतर-मंतर का इलाका लोगों से भरने लगा था। दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ और अन्य सुरक्षा बलों के जवान बड़ी संख्या में तैनात रहे। प्रदर्शन स्थल के आसपास बैरिकेडिंग की गई थी और सुरक्षा एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए थीं।
हालांकि भीड़ लगातार बढ़ रही थी, लेकिन प्रदर्शन काफी हद तक शांतिपूर्ण बना रहा। लोग अपनी मांगों को लेकर नारे लगा रहे थे और मंच से वक्ताओं के संबोधन सुन रहे थे।
सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंचा आंदोलन
इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसे कई लोग सोशल मीडिया से निकलकर सड़क पर उतरे एक बड़े जन आंदोलन के रूप में देख रहे हैं। पिछले कुछ समय से शिक्षा, भर्ती और परीक्षा संबंधी मुद्दों पर ऑनलाइन चल रही चर्चाएं अब जमीनी स्तर पर भी दिखाई देने लगी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शुरू होने वाले आंदोलनों के लिए वास्तविक दुनिया में लोगों को एकजुट करना आसान नहीं होता। लेकिन जंतर-मंतर पर दिखाई दी भीड़ ने यह संकेत दिया कि युवाओं के भीतर इन मुद्दों को लेकर गहरी चिंता मौजूद है।
छात्रों और अभ्यर्थियों ने रखी अपनी बात
प्रदर्शन में शामिल कई छात्रों ने कहा कि वे केवल एक परीक्षा या एक भर्ती प्रक्रिया के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर आए हैं।
कुछ अभ्यर्थियों का कहना था कि वर्षों की तैयारी के बावजूद भर्ती प्रक्रियाओं में देरी उनके भविष्य को प्रभावित कर रही है। वहीं कई छात्रों ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार और सरकारी संस्थानों को मजबूत करने की जरूरत बताई।
दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ शोधार्थियों ने उच्च शिक्षा में अवसरों की कमी, नियुक्तियों में देरी और बढ़ती अनिश्चितता को लेकर भी चिंता जाहिर की।
दोपहर तक बिखरा-बिखरा नजर आया प्रदर्शन
दोपहर के समय तक प्रदर्शन कई हिस्सों में बंटा हुआ दिखाई दे रहा था। अलग-अलग समूह अपने-अपने तरीके से नारेबाजी कर रहे थे। कहीं छात्र संगठन ढोलक और दफली के साथ नारे लगा रहे थे तो कहीं छोटे समूह चर्चा में व्यस्त दिखाई दिए।
भीषण गर्मी के कारण कई प्रदर्शनकारी सड़क पर बैठकर पानी और हल्के खाने के सहारे दिन गुजारते नजर आए। इसके बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ।
कई बार मंच से दिए जा रहे भाषण भीड़ के आखिरी हिस्से तक ठीक से नहीं पहुंच पा रहे थे। ऐसे में ऐसा महसूस हो रहा था जैसे एक ही स्थान पर कई छोटे-छोटे प्रदर्शन चल रहे हों।
सोनम वांगचुक के पहुंचते ही बदल गया पूरा माहौल
दोपहर बाद जब प्रसिद्ध शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पहुंचे, तब पूरे प्रदर्शन का माहौल बदल गया। हजारों लोगों का ध्यान अचानक एक मंच की ओर केंद्रित हो गया।
लोग मोबाइल फोन निकालकर उनकी तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड करने लगे। कई छात्र जो पहले इधर-उधर बैठे थे, वे भी उनके संबोधन को सुनने के लिए मंच के पास पहुंच गए।
एक तरह से देखा जाए तो जिस एकजुटता की कमी पूरे दिन महसूस हो रही थी, वह सोनम वांगचुक के आने के बाद दिखाई देने लगी।
“यह विरोध नहीं, एक आग्रह है”

अपने संबोधन में सोनम वांगचुक ने कहा कि यह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि व्यवस्था से सुधार की एक गंभीर अपील है। उन्होंने कहा कि यदि लोगों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आगे और बड़े कदम उठाए जा सकते हैं।
उन्होंने लोकतंत्र में शांतिपूर्ण संवाद और जनभागीदारी को महत्वपूर्ण बताया तथा युवाओं से अनुशासन बनाए रखने की अपील की।
शिक्षा व्यवस्था पर दिया बड़ा सुझाव
अपने भाषण के दौरान सोनम वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि देश के जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के बच्चों को सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ना चाहिए।
उनका मानना है कि जब नीति बनाने वालों का सीधा जुड़ाव सरकारी शिक्षा व्यवस्था से होगा, तब उसकी गुणवत्ता सुधारने की दिशा में अधिक गंभीर प्रयास किए जाएंगे।
उनके इस बयान पर प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों ने जोरदार समर्थन व्यक्त किया।
युवाओं में रोजगार को लेकर बढ़ती चिंता
प्रदर्शन में शामिल युवाओं के बीच केवल शिक्षा ही नहीं बल्कि रोजगार का मुद्दा भी प्रमुखता से दिखाई दिया। कई अभ्यर्थियों ने कहा कि डिग्री हासिल करने के बाद भी उन्हें अपेक्षित अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
कुछ युवाओं ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगाने के बाद भी अनिश्चितता बनी रहती है। ऐसे में भविष्य को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन केवल एक मांग तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह युवाओं की व्यापक चिंताओं का मंच बन गया।
क्या यह किसी बड़े आंदोलन की शुरुआत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जंतर-मंतर पर दिखाई दी भीड़ को केवल एक दिन के प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह देश के युवाओं के बीच बढ़ रही बेचैनी और बदलाव की मांग का संकेत भी हो सकता है।
हालांकि किसी भी आंदोलन की असली परीक्षा उसके अगले चरण में होती है। भीड़ जुटाना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसे लंबे समय तक संगठित रखना और ठोस परिणाम तक पहुंचाना कहीं अधिक कठिन काम होता है।
शाम होते-होते लौटने लगे प्रदर्शनकारी
शाम करीब साढ़े चार बजे के बाद लोग धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौटने लगे। सुरक्षा बलों ने भी स्थिति सामान्य होने के बाद अपनी तैनाती कम करनी शुरू कर दी।
लेकिन जंतर-मंतर पर बिताया गया यह दिन कई सवाल छोड़ गया। क्या युवाओं की आवाज नीति निर्माताओं तक पहुंचेगी? क्या शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाए जाएंगे? और क्या यह प्रदर्शन आने वाले समय में किसी बड़े जन आंदोलन का रूप ले सकता है?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे, लेकिन इतना जरूर है कि शनिवार को जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ ने यह संदेश साफ कर दिया कि देश का युवा अपने भविष्य को लेकर अब पहले से ज्यादा मुखर और सजग है।








