नई दिल्ली: राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान सोमवार को एक ऐसा मुद्दा उठा जिसने सीधे करोड़ों नौकरीपेशा लोगों की जेब को छू लिया। आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने सदन में Inflation Linked Salary Revision Act लागू करने की मांग करते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि भारत में वेतन को महंगाई से कानूनी रूप से जोड़ा जाए।
Raghav Chadha Parliament Speech के दौरान उन्होंने दावा किया कि वित्तीय वर्ष 2018 से 2026 के बीच Real Wages in India में करीब 16 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। उन्होंने इसे “मध्यम वर्ग की अदृश्य चोट” बताया।
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Inflation Linked Salary Revision Act क्या है?

इस प्रस्ताव का मकसद साफ है — अगर महंगाई बढ़े, तो कर्मचारियों की सैलरी भी उसी अनुपात में स्वतः बढ़े। यानी एक वैधानिक Salary Hike as per Inflation व्यवस्था लागू की जाए।
राघव चड्ढा ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हर साल महंगाई भत्ता मिलता है और समय-समय पर वेतन आयोग लागू होता है। लेकिन निजी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों कर्मचारियों के लिए ऐसा कोई सुरक्षा कवच नहीं है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में Wage Indexation India को लेकर स्पष्ट कानून की जरूरत है।
Why India needs an ‘Inflation Linked Salary Revision Act’, I argue in Parliament.
— Raghav Chadha (@raghav_chadha) February 12, 2026
Between FY18 and FY26, real wages for salaried Indians fell by 16% because pay hike did not keep pace with rising inflation. That is why in Parliament I raised that a mandatory wage indexation… pic.twitter.com/lT16OepqCI
16% गिरावट – आंकड़ा क्यों चौंकाने वाला है?
Raghav Chadha Parliament Speech के दौरान रखा गया 16 प्रतिशत का आंकड़ा सदन में चर्चा का केंद्र बन गया। उन्होंने कहा कि सैलरी भले ही नाममात्र बढ़ी हो, लेकिन महंगाई उससे तेज रफ्तार से बढ़ी।
यानी असल में कर्मचारियों की क्रय शक्ति कम हुई है। किराया, स्कूल फीस, स्वास्थ्य खर्च और रोजमर्रा का सामान – सब महंगा हुआ, लेकिन वेतन उसी गति से नहीं बढ़ा।
यही वजह है कि Real Wages in India का मुद्दा अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है।
दुनिया में क्या व्यवस्था है?
राघव चड्ढा ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी पेश किए। उन्होंने बताया कि अमेरिका में Cost of Living Adjustment (COLA) सिस्टम लागू है, जहां सैलरी और सामाजिक सुरक्षा भुगतान महंगाई से जुड़े होते हैं।
जर्मनी में 18 से 24 महीनों के भीतर वेतन समायोजन होता है। जापान में वार्षिक वेतन वार्ता के दौरान महंगाई इंडेक्स अहम भूमिका निभाता है। बेल्जियम में तो ऑटोमैटिक इंडेक्सेशन कानून है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अपने कर्मचारियों को महंगाई से बचा रही हैं, तो भारत में Wage Indexation India क्यों नहीं लागू हो सकता?
निजी सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?
अगर Inflation Linked Salary Revision Act लागू होता है, तो निजी कंपनियों को न्यूनतम महंगाई आधारित वेतन वृद्धि देना अनिवार्य हो सकता है।
उद्योग जगत के कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कंपनियों की लागत बढ़ेगी। लेकिन श्रम अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि अगर कर्मचारियों की आय स्थिर रहेगी, तो घरेलू मांग मजबूत होगी और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।
गिग वर्कर्स और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी भी शामिल?
राघव चड्ढा ने अपने भाषण में साफ किया कि यह प्रस्ताव सिर्फ कॉरपोरेट कर्मचारियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। गिग वर्कर्स, फैक्ट्री कर्मचारी और कॉन्ट्रैक्ट स्टाफ को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि करीब 45 प्रतिशत भारतीय वर्कफोर्स सैलरीड क्लास है और उन्हें महंगाई से कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
सरकार की प्रतिक्रिया क्या?
हालांकि सरकार की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, लेकिन संसद के गलियारों में इस मुद्दे पर चर्चा तेज है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि Salary Hike as per Inflation लागू करने के लिए स्पष्ट इंडेक्स तय करना होगा – क्या यह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित होगा या अलग वेज इंडेक्स बनेगा?
मध्यम वर्ग की उम्मीदें
सोशल मीडिया पर Raghav Chadha Parliament Speech के बाद प्रतिक्रिया की बाढ़ आ गई। कई नौकरीपेशा लोगों ने इसे “लंबे समय से लंबित सुधार” बताया।
एक बैंक कर्मचारी ने लिखा, “हर साल 4-5 प्रतिशत इंक्रीमेंट मिलता है, लेकिन महंगाई उससे कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। अगर Inflation Linked Salary Revision Act आता है, तो बड़ी राहत मिलेगी।”
क्या यह ऐतिहासिक बदलाव हो सकता है?
भारत में श्रम सुधारों की चर्चा अक्सर न्यूनतम वेतन या श्रम संहिताओं तक सीमित रही है। लेकिन यह प्रस्ताव सीधे मध्यम वर्ग की जेब और जीवन स्तर से जुड़ा है।
अगर सरकार इसे गंभीरता से लेती है और Wage Indexation India के तहत कोई मॉडल तैयार करती है, तो यह श्रम नीति के इतिहास में बड़ा कदम माना जाएगा।
आगे क्या?
फिलहाल Inflation Linked Salary Revision Act एक प्रस्ताव के रूप में सामने आया है। लेकिन संसद में उठी यह आवाज आने वाले महीनों में नीति बहस का केंद्र बन सकती है।
करोड़ों नौकरीपेशा लोगों के लिए यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उनके भविष्य और वित्तीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।
अब निगाहें सरकार पर हैं — क्या यह प्रस्ताव कानून में बदलेगा या सिर्फ बहस तक सीमित रहेगा?









