तीन महीने पहले की कहानी बिल्कुल उल्टी थी। अप्रैल-जून तिमाही में तीनों सरकारी तेल कंपनियां मिलकर करीब ₹18,150 करोड़ के घाटे में थीं। और अब, जुलाई-सितंबर तिमाही में तेल कंपनियों का मुनाफा ₹30,106 करोड़ पर पहुंच गया है। यह एक तिमाही की कमाई पिछले पूरे वित्त वर्ष (2025-26) के संयुक्त मुनाफे ₹77,281 करोड़ का करीब 39 प्रतिशत है। सवाल यह है कि अचानक ऐसा क्या बदल गया — और इसका आम आदमी की जेब पर क्या असर पड़ेगा?
किस कंपनी ने कितना कमाया?
इस पलटाव की सबसे बड़ी वजह इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) है। IOC ने इस तिमाही में ₹21,630 करोड़ का स्टैंडअलोन शुद्ध मुनाफा दर्ज किया है — यह कंपनी का अब तक का सबसे बड़ा तिमाही मुनाफा है और पिछले साल की समान तिमाही के ₹7,610 करोड़ से लगभग तीन गुना है।
भारत पेट्रोलियम (BPCL) का मुनाफा सालाना आधार पर 22.5 प्रतिशत घटकर ₹4,993 करोड़ रह गया, जबकि हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) का मुनाफा 9.1 प्रतिशत घटकर ₹3,483 करोड़ रहा। फिर भी दोनों कंपनियां घाटे से मुनाफे में लौट आईं — जून तिमाही में BPCL को ₹3,962 करोड़ और HPCL को करीब ₹11,526 करोड़ का घाटा हुआ था।

रिफाइनिंग मार्जिन: असली खेल कहां हुआ?
कहानी का केंद्र है रिफाइनिंग मार्जिन — यानी कच्चे तेल को पेट्रोल-डीजल में बदलने पर मिलने वाला मुनाफा। HPCL का ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन पिछले साल के 8.80 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 32.15 डॉलर प्रति बैरल हो गया, और BPCL का 10.78 डॉलर से बढ़कर 32.53 डॉलर प्रति बैरल। ऊंचे रिफाइनिंग मार्जिन और इन्वेंट्री (स्टॉक) के मूल्य में बढ़ोतरी ने ईंधन बिक्री पर हुए नुकसान और एलपीजी सब्सिडी के बकाए को भी पाट दिया। तीनों कंपनियों का संयुक्त रेवेन्यू भी करीब 29 प्रतिशत बढ़कर ₹5.60 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सितंबर अंत तक तीनों कंपनियों पर ईंधन अंडर-रिकवरी — यानी लागत और बिक्री मूल्य के अंतर — का कुल बोझ ₹67,900 करोड़ हो गया था। इसमें IOC का हिस्सा ₹32,505.69 करोड़, BPCL का ₹17,334.40 करोड़ और HPCL का ₹18,048.82 करोड़ है। IOC के फाइनेंस डायरेक्टर अनुज जैन ने निवेशकों को बताया कि एलपीजी पर प्रति सिलिंडर नुकसान सितंबर में ₹184 था, जो अक्टूबर में ₹229 हो गया और नवंबर में ₹309 तथा दिसंबर में ₹370 तक पहुंचने का अनुमान है। पिछले महीने तक कंपनियां पेट्रोल पर ₹4-5 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18-20 प्रति लीटर का नुकसान उठा रही थीं।
तो पेट्रोल-डीजल सस्ता क्यों नहीं हो रहा?
यही वह सवाल है जो हर गाड़ी मालिक के मन में है। जवाब यह है कि रिफाइनरी का मुनाफा और पंप का दाम एक ही चीज नहीं हैं। कंपनियों की कमाई इस तिमाही में रिफाइनिंग और इन्वेंट्री से आई है, जबकि खुदरा बिक्री — यानी पंप पर पेट्रोल-डीजल बेचना — अभी भी घाटे में है। जब तक ईंधन पर अंडर-रिकवरी और एलपीजी सब्सिडी का बकाया इतना बड़ा है, कंपनियों के पास दाम घटाने की गुंजाइश कम है।
आगे का रास्ता भी साफ नहीं है। IOC ने खुद चेतावनी दी है कि अगर पश्चिम एशिया की स्थिति सामान्य होने पर कच्चे तेल के दाम गिरते हैं, तो इन्वेंट्री के मूल्य में गिरावट से आने वाली तिमाहियों में मुनाफे पर दबाव आ सकता है। यानी यह रिकॉर्ड मुनाफा एक मजबूत तिमाही है, स्थायी राहत की गारंटी नहीं।
आम ग्राहक के लिए सार इतना है: तेल कंपनियों की सेहत सुधरी है, लेकिन इसका सीधा मतलब पंप पर सस्ता पेट्रोल नहीं है। दामों में बदलाव सरकार की नीति, वैश्विक कच्चे तेल के दाम और सब्सिडी के भुगतान पर निर्भर करेगा — और इन तीनों पर नज़र रखनी होगी।
स्रोत: The Hindu BusinessLine और Channeliam की Q2 नतीजों पर रिपोर्ट्स (1-2 नवंबर 2026)।

