
आज पूरा देश 79वां इन्फैंट्री दिवस 2026 मना रहा है। नई दिल्ली में राष्ट्रीय समर स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 27 अक्टूबर की तारीख भारतीय सेना के इतिहास में इतनी खास क्यों है? इसके पीछे एक ऐसी कहानी है जो आजादी के महज ढाई महीने बाद लिखी गई थी — हवाई जहाजों से, हिम्मत से और बलिदान से।
वह अक्टूबर, जब सब कुछ दांव पर था
आजादी के बाद जम्मू-कश्मीर की रियासत पर कबायली हमलावरों का हमला हुआ। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय के दस्तावेज (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए। अगले दिन, 27 अक्टूबर को गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे स्वीकार किया — और उसी दिन भारतीय सेना की पहली टुकड़ी श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरी।
ये सैनिक थे सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन के जवान, जो डकोटा विमानों से श्रीनगर पहुंचे। उनका मकसद साफ था — श्रीनगर की रक्षा करना और आगे बढ़ रहे हमलावरों को रोकना। कठिन पहाड़ी रास्ते, सीमित संसाधन और तेजी से बदलते मोर्चे — इन सबके बीच उन्होंने वह मोर्चा संभाला जो आजाद भारत की पहली बड़ी सैन्य कार्रवाई मानी जाती है।
इन्फैंट्री दिवस 2026 क्यों मनाया जाता है
पैदल सेना को सेना का ‘भाला’ कहा जाता है — वह सबसे पहले मोर्चे पर पहुंचती है और सबसे कठिन जमीन पर लड़ती है। इन्फैंट्री दिवस का मकसद तीन गुना है:
- सम्मान: उन पैदल सैनिकों की वीरता और बलिदान को याद करना, जिन्होंने 1947 में कश्मीर की रक्षा की।
- संदेश: यह बताना कि सेना देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए पहले दिन से तैयार थी।
- प्रेरणा: नई पीढ़ी को यह याद दिलाना कि राष्ट्र-निर्माण की शुरुआत ही चुनौतियों से हुई थी।
1947 की उस कार्रवाई से जुड़े अहम तथ्य
- 26 अक्टूबर 1947: महाराजा हरि सिंह ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए — रक्षा, विदेश मामले और संचार भारत को सौंपे गए।
- 27 अक्टूबर 1947: 1 सिख रेजिमेंट की टुकड़ी डकोटा विमानों से श्रीनगर पहुंची।
- उसके बाद: 1947-48 का युद्ध चला, फिर युद्धविराम हुआ।
- आज: हर साल 27 अक्टूबर को सेना देशभर में इन्फैंट्री दिवस मनाती है।
आज के दिन का संदेश
79 साल बीत गए, लेकिन उस सुबह का संदेश आज भी उतना ही साफ है — जब देश पर संकट आया, तो जवान सबसे पहले पहुंचे। आज जब हम समर स्मारक पर दीप जलाते हैं या शहीदों को नमन करते हैं, तो हम सिर्फ इतिहास नहीं दोहराते, बल्कि यह भरोसा भी जताते हैं कि देश की रक्षा करने वाला हाथ आज भी उतना ही मजबूत है।
पैदल सेना की भूमिका आज भी उतनी ही अहम है जितनी 1947 में थी। पहाड़, जंगल, रेगिस्तान और बर्फीली चोटियां — जहां वाहन नहीं पहुंच सकते, वहां पैदल सैनिक ही मोर्चा संभालता है। सीमा की निगरानी से लेकर आतंकवाद-रोधी अभियानों तक, हर जगह इन्फैंट्री सबसे आगे रहती है। इसीलिए सेना में कहा जाता है कि युद्ध का फैसला आखिर में पैदल सैनिक के कदमों से ही होता है।
इन्फैंट्री दिवस हमें यह भी सिखाता है कि आजादी सिर्फ 15 अगस्त की तारीख नहीं थी — उसे बचाने की लड़ाई उसके बाद भी लड़ी गई, और आज भी जारी है।
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स्रोत: Adda247 | Times of Taj

