नई दिल्ली। पिछले हफ्ते लाल सागर में एक साथ कई समुद्री इंटरनेट केबलों के कट जाने से दुनिया भर में हलचल मच गई। लाल सागर इंटरनेट केबल कट की इस घटना में SEA-ME-WE 4, IMEWE और FALCON GCX जैसी प्रमुख केबलें सऊदी अरब के पास क्षतिग्रस्त हो गईं। इसका असर भारत समेत मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के कई देशों में दिखा, जहां यूजर्स को धीमी स्पीड और इंटरमिटेंट कनेक्टिविटी का सामना करना पड़ा।

लेकिन सोचने वाली बात यह है — जब यूरोप-एशिया रूट का इतना बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया, तो भारत का इंटरनेट पूरी तरह ठप क्यों नहीं हुआ? जवाब छिपा है समुद्र तल में बिछे केबलों के वैकल्पिक नेटवर्क और भारत की बढ़ती डिजिटल तैयारी में।
लाल सागर इंटरनेट केबल कट: क्या हुआ था?
- घटना: सऊदी अरब के पास जेद्दा के समीप कई सबमरीन केबलें कटीं — SEA-ME-WE 4, IMEWE, FALCON GCX
- असर: NetBlocks के मुताबिक सऊदी अरब, पाकिस्तान, UAE और भारत में धीमी स्पीड; Microsoft Azure ने माना कि मध्य पूर्व से गुजरने वाले ट्रैफिक में देरी बढ़ी
- कारण: अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं; विशेषज्ञों का शुरुआती अनुमान — किसी कमर्शियल जहाज का लंगर घिसटने से केबलें कटीं
- वैश्विक असर: रिपोर्ट्स के मुताबिक वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक का लगभग 17% हिस्सा प्रभावित हुआ
विशेषज्ञों का कहना है कि लाल सागर क्षेत्र खास तौर पर संवेदनशील है, क्योंकि यहां केबलें अपेक्षाकृत उथले पानी में बिछी हैं। यही नहीं, इस क्षेत्र में हूथी विद्रोहियों द्वारा जहाजों पर हमलों का खतरा भी बना हुआ है, जिससे मरम्मत कार्य में और देरी हो सकती है।
केबलों की मरम्मत में हफ्तों से महीनों क्यों लगते हैं?
यहां समझना जरूरी है कि समुद्र के नीचे केबल ठीक करना सड़क पर तार जोड़ने जैसा नहीं है। पूरी दुनिया में सिर्फ तीन से चार कंपनियां ही ऐसे गहरे समुद्र के केबल ठीक करने में सक्षम हैं।
पहले खराबी की सटीक लोकेशन ढूंढनी पड़ती है, फिर विशेष केबल-रिपेयर जहाजों को वहां भेजा जाता है। जहाज के उपकरणों से समुद्र तल से केबल उठाई जाती है, खराब हिस्सा बदला जाता है और फिर उसे दोबारा रखा जाता है। मौसम, गहराई और सुरक्षा जोखिम के कारण यह प्रक्रिया हफ्तों से महीनों तक खिंच सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा क्षतिग्रस्त केबलों की मरम्मत में कई हफ्ते लग सकते हैं।
भारत की तैयारी: 3,600 किमी का I-2SEA प्रोजेक्ट
यहीं भारत की दीर्घकालिक तैयारी सामने आती है। I-2SEA नाम का एक नया 3,600 किलोमीटर लंबा समुद्री केबल सिस्टम बनाया जा रहा है, जो भारत के पूर्वी तट को सिंगापुर और मलेशिया से सीधे जोड़ेगा।
इस कंसोर्टियम में लाइटस्टॉर्म (बहुमत हिस्सेदारी), माइक्रोसॉफ्ट, सिंगटेल और टाटा कम्युनिकेशंस शामिल हैं। जापान की NEC कॉर्पोरेशन को सिस्टम सप्लायर और सिंगापुर की ASEAN केबलशिप को समुद्र में केबल बिछाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। भारत में दो लैंडिंग स्टेशन होंगे — आंध्र प्रदेश का मछलीपट्टनम और दक्षिण चेन्नई। मछलीपट्टनम को इसलिए चुना गया है क्योंकि यहां से हैदराबाद के डेटा सेंटर क्लस्टर तक सबसे कम समुद्री दूरी है।
यह केबल AI, क्लाउड और हाइपरस्केल कंप्यूटिंग वर्कलोड के लिए डिजाइन की गई है और 2029 की चौथी तिमाही तक चालू होने का लक्ष्य है।
क्यों यह भारत के लिए गेम-चेंजर है?
भारत का ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक अब तक मुंबई और चेन्नई के आसपास केंद्रित केबलों पर निर्भर रहा है — यह एक बड़ा जोखिम था। अब देश पूर्वी तट पर नए लैंडिंग पॉइंट बना रहा है: भारती एयरटेल विशाखापत्तनम में नया लैंडिंग स्टेशन बना रही है, और दीघा (पश्चिम बंगाल) जैसे नए स्थान भी तैयार हो रहे हैं।
साल 2026 की शुरुआत में दूरसंचार विभाग ने ऐसे नियम भी लागू किए, जिनके तहत बड़ी कंपनियां और हाइपरस्केलर पूर्ण टेलीकॉम लाइसेंस के बिना भी अपने निजी समुद्री केबल बना सकेंगी। यानी भविष्य में लाल सागर जैसी घटना भारत के इंटरनेट पर उतना असर नहीं डाल पाएगी — ट्रैफिक के पास ज्यादा रास्ते होंगे, और मरम्मत का जोखिम बंटा होगा।

