UPI शुल्क पर विधेयक और सरकारी स्पष्टीकरण के बाद यह सवाल बना हुआ है कि ग्राहक से पैसा लिया जाएगा या व्यापारी से। वित्त मंत्रालय की 15 सितंबर 2026 की नई स्पष्टता के अनुसार व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) भुगतान किसी भी राशि पर मुफ्त रहेगा। सरकार ने कहा कि ₹2,000 तक के व्यापारी भुगतान और निर्धारित छोटे-व्यापारी श्रेणी पर भी MDR शून्य रहेगा; संभावित शुल्क केवल निर्दिष्ट ₹2,000 से ऊपर के व्यापारी लेन-देन से जुड़े हैं। मंत्रालय ने अनुमान दिया कि लगभग 96% व्यापारी लेन-देन अप्रभावित रहेंगे। यह लेख ग्राहक शुल्क और व्यापारी MDR का फर्क समझाता है।
यहां “मुफ्त UPI” का अर्थ हर व्यापारी के हर भुगतान अनुबंध में एक जैसी लागत होना नहीं है। ग्राहक से कोई शुल्क न लेने की नीति और भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी के settlement की शर्तें अलग विषय हैं। लागू स्थिति जानने के लिए तारीख सहित सरकारी घोषणा और अपने बैंक/पेमेंट प्रदाता की लिखित शर्त देखें।
विवाद की जड़ क्या है
दरअसल 4 अगस्त 2026 को लोकसभा में ‘कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026’ पेश किया गया था, जिसे 6 अगस्त को विपक्ष के जोरदार हंगामे के बीच बिना किसी बहस के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। इसी विधेयक के जरिए Payment and Settlement Systems Act, 2007 की धारा 10A में एक संशोधन जोड़ा गया, जो बैंकों को भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वसूलने की छूट देता है। बस इसी एक प्रावधान ने पूरे देश में यह अटकल शुरू कर दी कि अब UPI से पेमेंट करने पर भी शुल्क देना पड़ सकता है।
आम जनता के लिए राहत की बात
वित्त मंत्रालय ने 8 अगस्त 2026 को कहा था कि उपभोक्ता लेन-देन और P2P भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। 15 सितंबर की बाद की विस्तृत सूचना ने दायरा और स्पष्ट किया: सभी P2P भुगतान मुफ्त हैं; ₹2,000 तक के व्यापारी लेन-देन और तय शर्तों वाले छोटे व्यापारियों पर MDR शून्य रहेगा। छोटे व्यापारी जिनकी P2PM श्रेणी में UPI QR से मासिक प्राप्तियां ₹1 लाख तक हैं, वे सभी लेन-देन पर शून्य MDR के दायरे में बताए गए। मंत्रालय के मुताबिक MDR केवल कुछ निर्दिष्ट ₹2,000 से ऊपर के व्यापारी लेन-देन पर लागू हो सकता है और लगभग 96% P2M लेन-देन अप्रभावित रहेंगे। इसे हर दुकान या हर ग्राहक पर शुल्क की घोषणा न समझें। मूल विवरण वित्त मंत्रालय/PIB की 15 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति और 8 अगस्त की सूचना में पढ़ें।
विपक्ष के आरोपों पर पलटवार
राजनीतिक हलकों में भी यह मुद्दा गरमाया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि क्या सरकार अमेरिकी कंपनियों को भारतीय डिजिटल भुगतान बाजार में फायदा पहुंचाने के इरादे से UPI के ढांचे को कमजोर कर रही है। इस आरोप को वित्त मंत्रालय ने पूरी तरह खारिज करते हुए इसे निराधार, झूठा और भ्रामक बताया।
RBI गवर्नर की सतर्क प्रतिक्रिया
विधेयक पेश होने के एक दिन बाद, 5 अगस्त को RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी इस मसले पर टिप्पणी की थी। उन्होंने MDR को लेकर किसी भी तरह की जल्दबाजी को नकारते हुए कहा कि डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की लागत आखिरकार किसी न किसी को तो उठानी ही पड़ती है, और फिलहाल RBI का जोर इस पूरे सिस्टम को और मजबूत व कुशल बनाने पर है। RBI की डिजिटल पेमेंट नीतियों से जुड़ी अधिक जानकारी RBI की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है। साफ है कि केंद्रीय बैंक भी किसी हड़बड़ी में फैसला लेने के मूड में नहीं है।
आंकड़े जो दिखाते हैं UPI की ताकत
इस पूरे विवाद को समझने के लिए UPI के मौजूदा कद पर नजर डालना जरूरी है। जुलाई 2026 में अकेले इस प्लेटफॉर्म पर 2,366 करोड़ लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब ₹29.9 लाख करोड़ रही। यह आंकड़े NPCI द्वारा नियमित रूप से जारी किए जाते हैं। 2016 में शुरू हुआ यह सिस्टम आज सिर्फ भारत तक सीमित नहीं, बल्कि 11 देशों में अपनी पहुंच बना चुका है। जनवरी 2020 में सरकार ने इस पर MDR को पूरी तरह शून्य कर दिया था, जिसके बाद से बैंक और फिनटेक कंपनियां लगातार सरकारी सब्सिडी के सहारे ही यह सेवा मुफ़्त बनाए रखे हुए थीं।
आगे फैसला किसके हाथ में
कानून में बदलाव भले ही हो चुका हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कल से ही चार्ज लगना शुरू हो जाएगा। रिपोर्ट्स की मानें तो अगर MDR लागू होता है तो वह ₹2,000 से अधिक के व्यापारी लेनदेन पर 0.25% से 0.4% के बीच हो सकता है, लेकिन इस पर अंतिम मुहर NPCI के नेतृत्व वाली “UPI and Services Steering Committee” ही लगाएगी। यही समिति तय करेगी कि किस सीमा से ऊपर के लेनदेन पर और कितनी दर से शुल्क वसूला जाए।
गौरतलब है कि यह संशोधन विधेयक सिर्फ UPI तक सीमित नहीं है। इसमें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को कर राहत, घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण को 2040-41 तक बढ़ावा देने और क्लाउड डेटा सेंटर्स से जुड़े नियमों को आसान बनाने जैसे कई अन्य प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। बाजार पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए यह भी जानना दिलचस्प होगा कि हाल ही में वेदांता डिमर्जर से जुड़ी खबर और शेयर बाजार में आई गिरावट जैसी बड़ी वित्तीय घटनाओं ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। फिलहाल स्थिति यह है कि आम उपभोक्ता निश्चिंत रह सकते हैं, लेकिन बड़े व्यापारिक लेनदेन के लिए आने वाले महीनों में स्टीयरिंग कमेटी का फैसला जरूर सुर्खियों में रहेगा।

