खास बातें, एक नजर में:
- HAL ने बेंगलुरु में भारतीय वायुसेना को पहले 3 स्वदेशी बेसिक ट्रेनर विमान HTT-40 सौंपे
- IAF में इस विमान को ‘अंकुर’ नाम दिया गया है
- नौसिखिया पायलटों की ट्रेनिंग शुरू होने में अभी 2 साल तक का वक्त लग सकता है
- IAF ने 70 विमानों का ₹6,838 करोड़ का ऑर्डर दिया है
- विमान में 56% स्वदेशी सामग्री, जिसे 60% से ज्यादा करने का लक्ष्य
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने 18 सितंबर को बेंगलुरु में भारतीय वायुसेना (IAF) को पहले तीन स्वदेशी HTT-40 ट्रेनर विमान सौंपे। रक्षा मंत्रालय के कार्यक्रम में इसी के साथ दो तेजस ट्विन-सीट ट्रेनर भी वायुसेना को सौंपे गए। यह भारत के स्वदेशी सैन्य विमानन के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

‘अंकुर’ नाम क्यों?
वायुसेना ने HTT-40 को सेवा में ‘अंकुर’ नाम दिया है — यानी वह नन्हा पौधा, जो आगे चलकर बड़ा पेड़ बनेगा। यह नाम इसलिए भी सटीक है, क्योंकि यही वह विमान है, जिस पर भविष्य के लड़ाकू पायलट अपनी पहली उड़ान का हुनर सीखेंगे। यह लंबे समय से सेवानिवृत्त हो चुके HPT-32 ‘दीपक’ ट्रेनर की जगह लेगा।
तो पायलटों को अभी क्यों इंतजार?
21 अक्टूबर को आई हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इन विमानों पर नौसिखिया पायलटों की पूरी ट्रेनिंग शुरू होने में अभी दो साल तक लग सकते हैं। इसकी वजह सीधी है — पहले इंस्ट्रक्टर तैयार होंगे, फिर कैडेट।
पहले चरण में ये तीनों विमान चेन्नई के पास तांबरम स्थित फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल में तैनात किए जाएंगे। वहां अनुभवी उड़ान प्रशिक्षक खुद इस प्लेटफॉर्म से परिचित होंगे, इसके स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तय करेंगे, प्रशिक्षण पाठ्यक्रम बनाएंगे और प्रशिक्षुओं के लिए दक्षता मानक निर्धारित करेंगे।
हैदराबाद के पास एयरफोर्स एकेडमी में कैडेटों की ट्रेनिंग तभी शुरू होगी, जब IAF के पास लगभग 25-30 विमानों का बेड़ा और पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित इंस्ट्रक्टर तैयार हो जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि नया सैन्य ट्रेनर लाना सिर्फ विमान मिलने जितना आसान नहीं — इंस्ट्रक्टर योग्यता, रखरखाव व्यवस्था, तकनीकी सहयोग और मानकीकृत उड़ान प्रक्रियाएं भी साथ-साथ तैयार करनी होती हैं।
HTT-40 ट्रेनर विमान ‘अंकुर’ की खासियत
| खूबी | विवरण |
|---|---|
| टॉप स्पीड | 400 किमी/घंटा |
| रेंज | 1,000 किलोमीटर |
| सर्विस सीलिंग | 6,000 मीटर |
| सीट व्यवस्था | टैंडम (एक के पीछे एक दो सीट) |
| कॉकपिट | एयर-कंडीशंड, आधुनिक डिजिटल एवियोनिक्स |
| इजेक्शन सीट | जीरो-जीरो इजेक्शन — शून्य ऊंचाई और शून्य गति पर भी सुरक्षित निकासी |
| रिफ्यूलिंग | हॉट रिफ्यूलिंग — इंजन चालू रहते हुए ईंधन भरने की सुविधा |
इंजन की चुनौती
HTT-40 ट्रेनर विमान में अमेरिकी कंपनी हनीवेल का TPE331-12B टर्बोप्रॉप इंजन लगा है। करीब चार साल पहले हुए 100 मिलियन डॉलर के समझौते के तहत हनीवेल 88 इंजन और किट में से 16 सीधे देगा, जबकि बाकी HAL टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत भारत में बनाएगा। इन्हीं इंजनों की आपूर्ति में आई बाधा के कारण वित्त वर्ष 2025-26 में योजनाबद्ध 12 विमानों की डिलीवरी नहीं हो सकी थी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही कंपोनेंट सप्लायर पर निर्भरता पूरे पायलट-प्रशिक्षण ढांचे को प्रभावित कर सकती है।
आगे का रास्ता
HAL की योजना उत्पादन बढ़ाकर सालाना करीब 20 विमान बनाने की है, ताकि 4-5 साल में सारी डिलीवरी पूरी हो सके। हाल ही में नौसेना के बेड़े में शामिल स्वदेशी पोत INS Samarthak भी इसी आत्मनिर्भर दिशा का प्रतीक है। विमान के पूरी तरह ऑपरेशनल परिपक्व होने के बाद 36 और विमानों का फॉलो-ऑन ऑर्डर भी योजनाबद्ध है। HAL 56% स्वदेशी सामग्री को बढ़ाकर 60% से ज्यादा करने पर काम कर रहा है। फिलहाल ये विमान 75 स्विस पिलाटस PC-7 Mk II ट्रेनरों के पूरक के रूप में काम करेंगे।
हर लड़ाकू पायलट की शुरुआत बेसिक ट्रेनर से होती है — सीमा पर सेना की तैयारियों के बीच यह ‘अंकुर’ भारत के पायलट-प्रशिक्षण ढांचे की रीढ़ बनेगा।
स्रोत: पीआईबी (18 सितंबर 2026 प्रेस विज्ञप्ति), विकिपीडिया (HAL HTT-40), डिफेंस न्यूज़ इंडिया

