दिल्ली की सर्दियों में जब धुंध और प्रदूषण की खबरें सुर्खियों में होती हैं, तो उंगली अक्सर डीजल ट्रकों की तरफ उठती है। अब इस समस्या का एक बड़ा समाधान तैयार हो रहा है — हाइड्रोजन ट्रक भारत में डीजल का विकल्प बनने जा रहे हैं। भारत सरकार हाइड्रोजन ट्रकों के इंजन और उनकी टेस्टिंग के लिए आधिकारिक मानक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यानी वह दिन दूर नहीं जब देश के हाईवे पर डीजल की जगह हाइड्रोजन से चलने वाले भारी ट्रक दौड़ते नजर आएंगे।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) सरकारी ऑटो टेस्टिंग एजेंसी ARAI के साथ मिलकर हाइड्रोजन-इंटरनल कम्बशन इंजन (H2-ICE) पावरट्रेन और उनके टेस्टिंग के तरीके तय कर रहा है। ARAI की वित्त वर्ष 2026 की वार्षिक रिपोर्ट में भी इस काम का जिक्र है।
H2-ICE क्या है? डीजल इंजन से कितना अलग?
हाइड्रोजन ट्रक दो तरीकों से चल सकते हैं। पहला है हाइड्रोजन फ्यूल सेल (H2FCV) — इसमें हाइड्रोजन से बिजली बनाकर मोटर चलाई जाती है। दूसरा है H2-ICE — इसमें हाइड्रोजन को डीजल की तरह ही इंजन में जलाकर ताकत पैदा की जाती है।
H2-ICE की खासियत यह है कि यह भारत की दशकों पुरानी इंजन बनाने की महारत पर खड़ा है। इंजन बनाने वाली फैक्ट्रियां, मैकेनिक और सर्विस नेटवर्क — सब कुछ लगभग वही रहेगा। इसलिए इसकी लागत फ्यूल सेल ट्रकों से कम होने की उम्मीद है और इसे बाजार में लाना भी तेज होगा। अशोक लेलैंड जैसी कंपनियां पहले से H2-ICE ट्रक और फ्यूल सेल ट्रक दोनों पर काम कर रही हैं — कंपनी के हाइड्रोजन ट्रकों ने रिलायंस और NTPC के साथ चल रहे परीक्षणों में 3 लाख किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय कर ली है। टाटा मोटर्स के पास भी हाइड्रोजन ट्रक मॉडल हैं।
सरकार क्यों कर रही है यह तैयारी?
इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं। पहला — प्रदूषण। भारी ट्रक डीजल जलाते हैं और शहरों, खासकर दिल्ली में, सर्दियों के प्रदूषण में इनकी बड़ी हिस्सेदारी होती है। दूसरा — ऊर्जा सुरक्षा। डीजल के लिए भारत कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। तीसरा — जलवायु लक्ष्य। भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है।
नीति आयोग की फरवरी 2026 की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि लंबी दूरी के माल ढुलाई में हाइड्रोजन पावरट्रेन इलेक्ट्रिक वाहनों की पूरक बन सकती है। मतलब, शहर के अंदर छोटी दूरी के लिए इलेक्ट्रिक ट्रक और लंबी दूरी के लिए हाइड्रोजन ट्रक — दोनों की अपनी जगह होगी।

मानक क्यों जरूरी हैं?
कोई भी नई तकनीक तभी बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है जब उसके सुरक्षा और गुणवत्ता के मानक तय हों। हाइड्रोजन एक हल्की और ज्वलनशील गैस है — इसके टैंक, इंजन और फ्यूलिंग स्टेशन के लिए सख्त नियम चाहिए।
इसी दिशा में केंद्र सरकार ने Central Motor Vehicles (Eighth Amendment) Rules, 2026 भी अधिसूचित किए हैं, जिनमें हाइड्रोजन से चलने वाले वाहनों के टाइप अप्रूवल के लिए अलग से नियम तय किए गए हैं। अब ARAI हाइड्रोजन इंजनों की टेस्टिंग के तरीके तय कर रहा है, ताकि हर कंपनी के ट्रक एक ही पैमाने पर जांचे जा सकें।
MNRE और Boston Consulting Group की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन हाइड्रोजन की पूरी वैल्यू चेन में 166 मानक और दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन 50 में से 23 हिस्सों में भारत के पास अभी कोई इस्तेमाल लायक मानक नहीं है। यही खाली जगह अब भरी जा रही है।
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: बड़ी तस्वीर
हाइड्रोजन ट्रकों का काम ₹19,744 करोड़ के राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का हिस्सा है, जिसे जनवरी 2023 में मंजूरी मिली थी। इसका लक्ष्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, इस्तेमाल और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।
लेकिन यहां एक सच्चाई भी है — भारत हर साल करीब 65 लाख टन हाइड्रोजन बनाता है, जिसमें ज्यादातर हिस्सा जीवाश्म ईंधन से बनने वाला ‘ग्रे हाइड्रोजन’ है। ग्रीन हाइड्रोजन (सौर/पवन ऊर्जा से बनने वाला) की उत्पादन क्षमता फरवरी 2026 तक सिर्फ 8,000 टन प्रति वर्ष थी। यानी हाइड्रोजन ट्रक तभी सच में ‘हरित’ कहलाएंगे जब ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन बड़े पैमाने पर बढ़ेगा।
चुनौतियां: सड़क से पहले क्या-क्या चाहिए?
हाइड्रोजन ट्रक भारत में तीन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। पहली — फ्यूलिंग स्टेशन। देशभर में हाइड्रोजन भरने के स्टेशन बनाने होंगे, वरना ट्रक हाईवे पर फंस जाएंगे। दूसरी — लागत। हाइड्रोजन अभी डीजल से महंगा है, और जब तक बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं होगा, कीमत नीचे नहीं आएगी। तीसरी — तकनीशियन और सप्लाई चेन। हाइड्रोजन वाहनों की मरम्मत के लिए प्रशिक्षित लोग और पुर्जों की आपूर्ति चाहिए।
इन चुनौतियों के बावजूद दिशा साफ है। इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए PM E-DRIVE जैसी योजनाओं के तहत ARAI समेत चार टेस्टिंग एजेंसियों को ₹780 करोड़ मिले हैं। सरकार हाइड्रोजन बसों और ट्रकों के पायलट प्रोजेक्ट भी चला रही है, जिनमें फ्यूलिंग स्टेशनों की सुरक्षा और आर्थिक व्यवहार्यता जांची जा रही है।
कब दिखेंगे हाइड्रोजन ट्रक भारत की सड़कों पर?
मानकों के तय होते ही कंपनियों के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री का रास्ता खुलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले चरण में माइनिंग, बंदरगाह और तय रूटों पर चलने वाले ट्रक हाइड्रोजन अपनाएंगे — क्योंकि इनके रूट तय होते हैं और फ्यूलिंग स्टेशन भी उसी रूट पर बनाए जा सकते हैं। आम हाईवे पर हाइड्रोजन ट्रकों का आम होना अभी कुछ साल दूर है।
निष्कर्ष: हाइड्रोजन ट्रक भारत के माल ढुलाई के भविष्य की कहानी है, सिर्फ एक नई तकनीक नहीं। मानक बनने से यह कहानी कागज से निकलकर सड़क पर उतरने की ओर बढ़ रही है। डीजल की छुट्टी एक दिन में नहीं होगी, लेकिन उसकी उलटी गिनती अब शुरू हो चुकी है।

