लिचेंस्टीन प्रिंस अलोइस भारत दौरा रविवार, 25 अक्टूबर से शुरू हो रहा है। यूरोप के इस छोटे से देश के कार्यकारी राष्ट्राध्यक्ष, हेरेडिटरी प्रिंस अलोइस, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर 25 से 28 अक्टूबर तक भारत की राजकीय यात्रा पर रहेंगे। उनके साथ उनकी पत्नी हेरेडिटरी प्रिंसेस सोफी, एक उच्चस्तरीय आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल और उद्योग जगत के शीर्ष नेताओं वाला व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी आ रहा है।
आकार में छोटा होने के बावजूद लिचेंस्टीन एक बेहद समृद्ध और तकनीकी रूप से उन्नत देश है — और यही वजह है कि इस यात्रा को सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यापार और तकनीक के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
कौन हैं प्रिंस अलोइस?
प्रिंस अलोइस लिचेंस्टीन के शासक प्रिंस हंस-एडम द्वितीय के पुत्र हैं और देश के कार्यकारी राष्ट्राध्यक्ष (एक्टिंग हेड ऑफ स्टेट) के रूप में कामकाज संभालते हैं। यानी व्यावहारिक रूप से वे ही देश के शासन की अगुवाई करते हैं।
भारत से उनका रिश्ता नया नहीं है। यह 2026 में उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी — इससे पहले फरवरी में वे नई दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट में शामिल हुए थे, जहां हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री मोदी से उनकी द्विपक्षीय मुलाकात भी हुई थी। इससे पहले वे 2010 और 2018 में भी भारत आ चुके हैं।
यात्रा में क्या-क्या होगा?
विदेश मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और प्रिंस अलोइस के बीच द्विपक्षीय वार्ता होगी, जिसमें व्यापार और निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार तथा लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान पर चर्चा होगी। क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया जाएगा।
प्रिंस अलोइस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी मिलेंगे, जो उनके सम्मान में आधिकारिक भोज (बैंक्वेट) की मेजबानी करेंगी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी उनसे मुलाकात करेंगे।
EFTA समझौता: असली वजह
इस यात्रा के पीछे सबसे बड़ा आर्थिक संदर्भ भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौता है, जो 2025 में लागू हुआ। EFTA में स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिचेंस्टीन शामिल हैं। इस समझौते के बाद भारत और इन देशों के बीच व्यापार-निवेश सहयोग को नई गति मिली है, और विदेश मंत्रालय का कहना है कि प्रिंस अलोइस की यात्रा इसी बढ़ती साझेदारी को और मजबूत करेगी।
भारत और लिचेंस्टीन के बीच राजनयिक संबंध 1993 में स्थापित हुए थे — स्विट्जरलैंड में भारत के राजदूत को ही लिचेंस्टीन के लिए भी मान्यता प्राप्त है। 2023 में इस रिश्ते के 30 साल पूरे हुए थे।
छोटे देश, बड़ी तकनीक — भारत को क्या मिलेगा?
लिचेंस्टीन भले ही क्षेत्रफल में दिल्ली से भी छोटा हो, लेकिन यह सटीक इंजीनियरिंग, वित्तीय सेवाओं और उच्च तकनीक वाले विनिर्माण के लिए जाना जाता है। भारत के लिए इस यात्रा का फायदा तीन स्तरों पर हो सकता है — यूरोपीय बाजारों तक पहुंच, उन्नत तकनीक में सहयोग और EFTA समझौते के तहत निवेश का विस्तार।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे छोटे लेकिन समृद्ध देशों के साथ गहरे रिश्ते भारत की ‘विविध साझेदारियों’ वाली विदेश नीति का हिस्सा हैं — जहां हर साझेदार, चाहे कितना भी छोटा हो, अपनी खास ताकत लेकर आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
लिचेंस्टीन कहां है? यह आल्प्स पर्वतों में स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया के बीच स्थित एक छोटा यूरोपीय देश है।
प्रिंस अलोइस की यात्रा कब तक चलेगी? 25 से 28 अक्टूबर 2026 तक — कुल चार दिन।
इस यात्रा में सबसे अहम क्या है? प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता और EFTA समझौते के बाद व्यापार-निवेश सहयोग को आगे बढ़ाना।
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