भारतीय नौसेना ने गोवा में राफेल मरीन लड़ाकू विमान के ट्रायल शुरू कर दिए हैं। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक ये ट्रायल इस बात को परखने के लिए हो रहे हैं कि राफेल मरीन विक्रांत विमानवाहक पोत से संचालन के लिए क्या-क्या बदलाव जरूरी हैं। ANI की खबर के अनुसार, बुधवार (21 अक्टूबर 2026) से गोवा में ये परीक्षण चल रहे हैं।

ट्रायल क्यों हो रहे हैं? समझिए पूरा मामला
राफेल मरीन फ्रांस की Dassault Aviation का बनाया कैरियर-आधारित लड़ाकू विमान है, जो पहले से फ्रांसीसी नौसेना में तैनात है। भारत ने 28 अप्रैल 2025 को फ्रांस के साथ लगभग 63,000 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक रक्षा समझौता किया था, जिसके तहत 26 राफेल मरीन (22 सिंगल-सीट और 4 ट्विन-सीट ट्रेनर) खरीदे जाएंगे। भारत इस विमान का पहला अंतरराष्ट्रीय ऑपरेटर होगा।
लेकिन एक अहम तकनीकी चुनौती है: फ्रांसीसी राफेल मरीन कैटापल्ट लॉन्च वाले कैरियर के लिए डिजाइन किया गया है, जबकि INS विक्रांत STOBAR (स्की-जंप) सिस्टम पर काम करता है — यानी छोटे रैंप से टेक-ऑफ और अरेस्टर वायर से लैंडिंग। गोवा में नौसेना के शोर-बेस्ड टेस्ट फैसिलिटी (SBTF) में बने स्की-जंप रैंप पर इन्हीं परिस्थितियों का परीक्षण हो रहा है।
ट्रायल में क्या-क्या परखा जा रहा है?
रक्षा सूत्रों के मुताबिक इन परीक्षणों का मकसद विमान में जरूरी संरचनात्मक और सॉफ्टवेयर बदलावों की पहचान करना है:
- लैंडिंग गियर — स्की-जंप टेक-ऑफ और अरेस्टेड लैंडिंग के दबाव को सहने की क्षमता
- लॉन्च परफॉर्मेंस — छोटे रैंप से पूरी तरह हथियारों से लदे विमान का सुरक्षित टेक-ऑफ
- ऑनबोर्ड सॉफ्टवेयर — कैरियर ऑपरेशन के हिसाब से जरूरी ट्यूनिंग
- डेक सिस्टम कम्पैटिबिलिटी — अरेस्टिंग गियर और डेक मार्किंग के साथ तालमेल
ट्रायल के नतीजों के आधार पर ही Dassault विमानों में जरूरी संशोधन करेगा, ताकि 2028 में डिलीवरी शुरू होने से पहले सब कुछ तैयार रहे।
डील की खास बातें
- डिलीवरी शेड्यूल: सभी 26 विमान 2028 के अंत या 2029 की शुरुआत तक मिल जाएंगे
- आत्मनिर्भर भारत: समझौते में स्वदेशी हथियारों के इंटीग्रेशन के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत में राफेल फ्यूजलेज उत्पादन सुविधा और इंजन-सेंसर-हथियारों के मेंटेनेंस हब शामिल हैं
- प्रशिक्षण: पायलट ट्रेनिंग, फ्लाइट सिम्युलेटर, हथियार और लॉन्ग-टर्म मेंटेनेंस सपोर्ट डील का हिस्सा हैं
भारतीय नौसेना के पास फिलहाल दो विमानवाहक पोत हैं — INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य। राफेल मरीन दोनों से संचालित हो सकेंगे और धीरे-धीरे नौसेना के MiG-29K बेड़े की जगह लेंगे। वायुसेना के पास पहले से 36 राफेल हैं — नौसेना के ऑर्डर के बाद भारत में इस विमान की कुल संख्या 62 हो जाएगी, जिससे ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक्स में साझा लाभ मिलेगा।
नौसेना को क्या मिलेगा?
राफेल मरीन नौसेना की क्षमताओं को कई मोर्चों पर बढ़ाएगा — एयर डिफेंस, समुद्री हमला (मैरीटाइम स्ट्राइक), टोही (रिकॉनेसांस) और तटीय ठिकानों पर हमले। ये विमान दुश्मन के लड़ाकू विमानों को बेड़े की हवाई रक्षा सीमा से बाहर ही रोकने में सक्षम होंगे, जिससे नौसेना समुद्र पर अपना नियंत्रण और मजबूत कर सकेगी।
2026 के अंत से पहले एक फ्रांसीसी राफेल मरीन के INS विक्रांत पर पहली लैंडिंग की भी खबरें हैं — वह ट्रायल डेक सिस्टम्स की अनुकूलता को अंतिम रूप देगा। कुल मिलाकर, हिंद महासागर में भारत की समुद्री ताकत के लिए यह एक निर्णायक कदम है।

