मुख्य सामग्री पर जाएँ
बुधवार, 04 नवम्बर 2026
पहली खबर
पहलीखबर
ताजा हिंदी समाचार
ब्रेकिंग न्यूज़
कार फैक्ट्रियों की बाढ़: पुणे बना ऑटो हब, 5.4 मिलियन sq ft लीज  |  5वें दिन भी चमका बाजार: सेंसेक्स 77,301 पार, अब निवेशक क्या करें?  |  बजाज ने महिंद्रा को पछाड़ा: इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर का नया नंबर-1  |  15 दिसंबर से बदल जाएगा कार-बाइक इंश्योरेंस: 4 लेयर वाला नया नियम  |  iPhone बताएगा आपकी असली उम्र: Apple का नया AI Health App आ गया
Home / ऑटोमोबाइल

कार फैक्ट्रियों की बाढ़: पुणे बना ऑटो हब, 5.4 मिलियन sq ft लीज

भारत में ऑटो फैक्ट्रियों का बड़ा विस्तार: 5.4 मिलियन वर्ग फुट जगह लीज पर, पुणे सबसे आगे, दिल्ली-NCR दूसरे और चेन्नई तीसरे नंबर पर। जानिए इसका नौकरियों, EV और आम खरीदार पर क्या असर होगा।

ऑटो उद्योग विस्तार भारत कार फैक्ट्री उत्पादन

ऑटो उद्योग विस्तार की रफ्तार भारत में अब आंकड़ों में साफ दिखने लगी है। रियल एस्टेट सलाहकार कंपनी CBRE की नई रिपोर्ट के मुताबिक देश के ऑटोमोबाइल और ऑटो कलपुर्जा (एंसिलरी) सेक्टर ने साल 2024 से लेकर 2026 की पहली छमाही के बीच करीब 5.4 मिलियन वर्ग फुट औद्योगिक जगह लीज पर ली है। यह देश की कुल औद्योगिक मांग का लगभग 13 प्रतिशत है। यानी हर आठ में से एक वर्ग फुट नई औद्योगिक जगह अब ऑटो सेक्टर ले रहा है। यह रिपोर्ट 4 नवंबर 2026 को सामने आई है और इसमें भारत के मैन्युफैक्चरिंग भविष्य की साफ तस्वीर दिखती है।

ऑटो उद्योग विस्तार: रिपोर्ट के 5 बड़े आंकड़े

पहला आंकड़ा है 5.4 मिलियन वर्ग फुट की लीजिंग, जो 2024 से जून 2026 के बीच हुई। दूसरा, इस मांग में घरेलू कंपनियों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 57 प्रतिशत रही, जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की कंपनियों ने 26 प्रतिशत और यूरोप, मध्य-पूर्व व अफ्रीका की कंपनियों ने 15 प्रतिशत जगह ली। तीसरा, शहरों के लिहाज से पुणे 28 प्रतिशत हिस्से के साथ नंबर-1 रहा, दिल्ली-NCR 25 प्रतिशत के साथ दूसरे और चेन्नई 20 प्रतिशत के साथ तीसरे नंबर पर रहा। चौथा, वित्त वर्ष 2026 में देश में वाहनों का उत्पादन 3.5 करोड़ यूनिट तक पहुंच गया। पांचवां, ऑटो निर्यात सालाना 14.7 प्रतिशत बढ़कर लगभग 26 अरब डॉलर हो गया है। CBRE के मुताबिक यह सेक्टर अब देश के कुल मैन्युफैक्चरिंग सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग आधा योगदान देता है।

पुणे क्यों बन गया ऑटो का सबसे बड़ा हब

पुणे की बढ़त की वजह सिर्फ एक नहीं है। यहां पहले से बड़े वाहन निर्माताओं और कलपुर्जा कंपनियों का जाल फैला हुआ है, कुशल कारीगर और इंजीनियर आसानी से मिलते हैं, और मुंबई बंदरगाह से नजदीकी निर्यात को आसान बनाती है। दिल्ली-NCR को उत्तर भारत के बड़े बाजार और सप्लायर नेटवर्क का फायदा मिलता है, जबकि चेन्नई बंदरगाह और स्थापित ऑटो क्लस्टर के दम पर तीसरे नंबर पर है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कंपनियां अब सिर्फ जगह नहीं, बल्कि बड़ी और तकनीकी रूप से आधुनिक फैक्ट्रियां चाहती हैं। 2026 की पहली छमाही में 1 लाख से 2 लाख वर्ग फुट की फैक्ट्रियों की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत और 2 लाख वर्ग फुट से बड़ी फैक्ट्रियों की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत रही — यानी कुल लीजिंग का 84 प्रतिशत बड़े फॉर्मेट की फैक्ट्रियों में हुआ।

ऑटो उद्योग विस्तार औद्योगिक पार्क नई कारें
ऑटो उद्योग विस्तार भारत फैक्ट्री पुणे (प्रतीकात्मक फोटो)

EV और एडवांस कलपुर्जों ने बदली तस्वीर

इस विस्तार के पीछे सिर्फ पुरानी गाड़ियों की मांग नहीं है। CBRE के भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के चेयरमैन और CEO अंशुमन मैगज़ीन के मुताबिक घरेलू मांग ने पैमाना दिया है, जबकि मजबूत निर्यात, इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन और एडवांस कलपुर्जों के निर्माण ने इस आधार को और चौड़ा किया है। उन्होंने यह भी कहा कि अब कंपनियों की प्रतिस्पर्धा इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें औद्योगिक जमीन, भरोसेमंद बुनियादी ढांचा और बिजली-पानी की सुविधा, कुशल लोग, सप्लायर नेटवर्क और लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी कितनी अच्छी मिलती है। वेयरहाउसिंग के मोर्चे पर भी यही कहानी है — 2021 से 2026 की पहली छमाही के बीच ऑटो और एंसिलरी सेगमेंट ने करीब 12.4 मिलियन वर्ग फुट वेयरहाउस जगह लीज पर ली, जिसमें चेन्नई 29 प्रतिशत के साथ आगे रहा, उसके बाद दिल्ली-NCR 22 प्रतिशत और बेंगलुरु 14 प्रतिशत पर रहे। टायर निर्माताओं, यात्री वाहन कंपनियों और कलपुर्जा सप्लायरों ने मिलकर वेयरहाउस मांग का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा लिया।

आम आदमी पर क्या असर होगा

बड़ी फैक्ट्रियों का मतलब सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। नई फैक्ट्रियों से सबसे पहले स्थानीय स्तर पर नौकरियां बनती हैं — इंजीनियर, तकनीशियन, लॉजिस्टिक्स कर्मचारी और सप्लायर यूनिटों में काम करने वाले लोग। दूसरा, जब उत्पादन क्षमता बढ़ती है तो कंपनियां नए मॉडल और इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से उतार पाती हैं, जिससे खरीदारों के पास विकल्प बढ़ते हैं। तीसरा, निर्यात बढ़ने से देश की विदेशी मुद्रा आय मजबूत होती है, जो लंबे समय में अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। हालांकि एक चुनौती भी है: फैक्ट्रियों के लिए जमीन और सुविधाएं हर शहर में एक जैसी नहीं हैं, इसलिए कंपनियां उन्हीं शहरों में जा रही हैं जहां इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार है। इससे कुछ क्षेत्रों में विकास तेज होगा और कुछ पीछे रह सकते हैं।

आने वाले महीनों में नजर इस बात पर रहेगी कि नई फैक्ट्रियों से उत्पादन और निर्यात के आंकड़े कितनी तेजी से बढ़ते हैं, और क्या EV व एडवांस कलपुर्जों की हिस्सेदारी और बढ़ती है। फिलहाल इतना तय है कि भारत का ऑटो सेक्टर सिर्फ गाड़ियां बेचने का बाजार नहीं रहा — यह अब दुनिया के लिए गाड़ियां बनाने का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।

ऑटो उद्योग विस्तार की यह कहानी अभी जारी है: ऑटो उद्योग विस्तार से नौकरियां और निर्यात दोनों बढ़ेंगे, और ऑटो उद्योग विस्तार का असर आम खरीदार तक भी पहुंचेगा।

यह भी पढ़ें: Tata-Iveco ग्लोबल डील | बजाज इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर में नंबर-1 | BYD की रिकॉर्ड EV बिक्री

स्रोत: Hi India रिपोर्ट

लेखक

Rakesh Kumar

नमस्कार, मैं राकेश कुमार हूँ। PAHALI KHABAR के माध्यम से मैं आपके लिए ऑटोमोबाइल, टेक्नोलॉजी, खेल और अन्य महत्वपूर्ण खबरें लेकर आता हूँ। मेरा उद्देश्य है कि आपको हर खबर सरल भाषा में, सही तथ्यों के साथ और समय पर मिले।

और खबरें पढ़ें ›