भारत की सड़कों पर एक खामोश क्रांति चल रही है — और उसकी आवाज़ सबसे ज्यादा ई-रिक्शा की हल्की सी गड़गड़ाहट में सुनाई देती है। महिंद्रा लास्ट माइल मोबिलिटी के प्लांट में हर 90 सेकंड में एक इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा असेंबली लाइन से उतरता है। मजदूर और रोबोट मिलकर बैटरी पैक फिट करते हैं, बॉडी पैनल लगाते हैं और पहिए कसते हैं — और यह रफ्तार किसी त्योहारी सीजन की नहीं, रोज़ की हकीकत है।
आज, 8 नवंबर को आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा बैटरी-चालित ऑटो रिक्शा बाजार बन चुका है। और यह सिर्फ एक खिताब नहीं — आंकड़े खुद कहानी कहते हैं।

आंकड़े जो हैरान कर दें: इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के मुताबिक सितंबर 2026 में भारत में 86,024 इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बिके — पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी ज्यादा। कुल थ्री-व्हीलर बिक्री में इलेक्ट्रिक की हिस्सेदारी 64.9 फीसदी पहुंच गई, जो एक साल पहले 56.7 फीसदी थी। यानी सितंबर में बिका हर तीन में से दो थ्री-व्हीलर इलेक्ट्रिक था।
अक्टूबर में भी यह रफ्तार थमी नहीं — इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर की हिस्सेदारी 62.6 फीसदी रही, और पूरे देश में कुल EV रजिस्ट्रेशन 3,54,137 तक पहुंच गए, जो अब तक का सबसे ऊंचा मासिक आंकड़ा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक 2025 में भारत में करीब 8 लाख इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बिके थे — दुनिया में सबसे ज्यादा।
चालक की जेब ही असली वजह है
ई-रिक्शा की इस कामयाबी के पीछे कोई सरकारी सब्सिडी का जादू नहीं, बल्कि सीधा-सादा गणित है — चालक की जेब। भारतीय थिंक टैंक CEEW के 2025 के अनुमान के मुताबिक पेट्रोल वाले थ्री-व्हीलर की प्रति किलोमीटर लागत पूरे जीवनकाल में इलेक्ट्रिक के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा पड़ती है।
बैटरी की कीमतें गिर रही हैं और ईंधन महंगा हो रहा है, तो फायदा हर दिन बढ़ता जा रहा है। एक इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा चालक रोज़ाना चार्जिंग पर सैकड़ों रुपये बचाता है — और वही बचत उसके वाहन के लोन की किस्त चुकाने में मदद करती है। शहर की भीड़-भाड़ वाली गलियों में छोटा, फुर्तीला और सस्ता वाहन — यही वजह है कि ई-रिक्शा पहले दिल्ली की सड़कों पर दिखा और अब छोटे शहरों-कस्बों तक पहुंच गया है।
फैक्ट्री से लेकर ग्लोबल मंच तक
इस बदलाव की रफ्तार का अंदाजा इसी से लगता है कि महिंद्रा लास्ट माइल मोबिलिटी को पर्यावरण के क्षेत्र में प्रतिष्ठित अर्थशॉट प्राइज के 15 फाइनलिस्ट में चुना गया है, जिसका ऐलान 17 नवंबर को मुंबई में प्रिंस विलियम करेंगे।
बाजार में बजाज ऑटो सितंबर में सबसे आगे रही — 15,109 इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर के साथ। महिंद्रा ग्रुप 14,716 यूनिट के साथ दूसरे नंबर पर रहा, और टीवीएस मोटर भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रही है।
कारों से कहीं आगे क्यों?
दिलचस्प बात यह है कि थ्री-व्हीलर में इलेक्ट्रिक की हिस्सेदारी (64.9%) कारों (8.5%) और दोपहिया वाहनों (11.6%) से कई गुना ज्यादा है। वजह साफ है — थ्री-व्हीलर ज्यादातर कमर्शियल इस्तेमाल में आते हैं, जहां रोज़ का खर्च ही खरीद का फैसला करता है। निजी कार खरीदने वाला भावना से भी खरीदता है, लेकिन रिक्शा चालक हर रुपये का हिसाब रखता है।
इसीलिए जानकार मानते हैं कि भारत में इलेक्ट्रिक क्रांति की असली कहानी लग्जरी EV कारों में नहीं, बल्कि इन छोटे तीन पहियों वाले वाहनों में लिखी जा रही है।
आगे क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि अब विकास का अगला चरण थोड़ा धीमा हो सकता है, क्योंकि बाजार का दो-तिहाई हिस्सा पहले ही इलेक्ट्रिक हो चुका है। अगली लड़ाई पुराने CNG वाहनों को इलेक्ट्रिक में बदलने और रिप्लेसमेंट डिमांड की होगी। लेकिन एक बात तय है — भारत की सड़कों पर ई-रिक्शा अब कोई प्रयोग नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन चुका है।
अगली बार जब कोई इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा आपके पास से बिना धुएं और बिना शोर के गुजरे, तो जान लीजिए — वह सिर्फ एक सवारी नहीं, दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बाजार की पहचान है।
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स्रोत: AFP/TechXplore, FADA सितंबर 2026 डेटा, The Hindu BusinessLine

