फैसला एक नजर में
- मामला: Chavan Dharmendar & Ors. बनाम State of Telangana (2026 INSC 1133)
- फैसला तारीख: 12 अक्टूबर 2026
- बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
- नतीजा: एसबीआई अधिकारियों के खिलाफ 2019 में दर्ज SC/ST Act FIR रद्द
किसी कंपनी का लोन NPA हो जाए और बैंक वसूली की प्रक्रिया शुरू करे, तो क्या सिर्फ इस आधार पर बैंक अफसरों पर SC/ST Act दुरुपयोग का केस चल सकता है कि कंपनी के डायरेक्टर अनुसूचित जाति या जनजाति से हैं? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब साफ शब्दों में दिया है — नहीं। जब तक जाति के आधार पर अपमान या नीचा दिखाने का कोई ठोस आरोप न हो, केवल लोन विवाद को जातिगत भेदभाव का रंग नहीं दिया जा सकता।

मामला क्या था
तेलंगाना की एक छोटी औद्योगिक इकाई (Small Scale Industry) 2010 से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कर्ज ले रही थी। कंपनी ने बैंक से लिए कर्ज के बदले अपनी संपत्ति गिरवी भी रखी थी। 2012-13 में कंपनी को करीब 2 करोड़ रुपये का घाटा हुआ, फिर भी उसने 2.90 करोड़ रुपये का टर्म लोन चुकाया। 2016 में खाता NPA घोषित हो गया — इसके बाद भी प्रमोटरों ने खाता नियमित कराने के लिए 45 लाख रुपये जमा किए।
कंपनी के डायरेक्टरों का आरोप था कि बैंक अधिकारियों ने उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया, ऊंचे अधिकारियों को झूठी जानकारी दी और कागजात में हेराफेरी की। उनका यह भी आरोप था कि ऊंची जाति के प्रभावशाली उद्यमियों की कंपनियों को दो-दो बार पुनर्वास पैकेज (Rehabilitation Package) और भारी छूट मिली, जबकि SC/ST उद्यमियों की कंपनियों को यह राहत नहीं दी गई। RBI के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन की शिकायत भी दर्ज कराई गई।
फरवरी 2019 में हैदराबाद CID थाने में बैंक अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज हुई। तेलंगाना हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि आरोपियों को मुकदमे का सामना करना होगा। इसके खिलाफ बैंक अधिकारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस चंद्रन की बेंच ने FIR रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है, लेकिन इसे बैंकिंग वसूली जैसे सिविल-वाणिज्यिक विवादों में हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा:
- ठोस आरोप जरूरी: जाति के आधार पर अपमान या नीचा दिखाने का कोई ठोस, विशेष आरोप होना चाहिए — केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि शिकायतकर्ता SC/ST समुदाय से है।
- सिविल विवाद बना रहता है: लोन, NPA और वसूली से जुड़ा विवाद मूलतः एक बैंकिंग-सिविल मामला है; इसे आपराधिक धाराओं में खींचने के लिए अलग तथ्य होने चाहिए।
- कानून का मकसद: SC/ST Act वंचितों के लिए ढाल है, प्रतिद्वंद्विता या दबाव के लिए तलवार नहीं — अदालतें पहले भी इस SC/ST Act दुरुपयोग की चेतावनी देती रही हैं।
SC/ST Act दुरुपयोग पर यह फैसला क्यों है अहम
यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र के साथ-साथ सभी व्यापारियों और पेशेवरों के लिए राहत का संदेश है। अब तक कई मामलों में सिविल विवादों को जातिगत अपराध में बदलकर दबाव बनाने की शिकायतें आती रही थीं। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख कहता है कि कानून का दुरुपयोग उतना ही खतरनाक है, जितना उसके संरक्षण का न मिलना।
दूसरी तरफ, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि वास्तविक जातिगत अत्याचार के मामलों में यह कानून पूरी ताकत से लागू होना चाहिए। मतलब साफ है — SC/ST Act दुरुपयोग रोका जाएगा, लेकिन असली पीड़ितों का अधिकार कायम रहेगा।
(स्रोत: 22 अक्टूबर को डेक्कन हेराल्ड समेत कई अखबारों में प्रकाशित रिपोर्ट; पूरी जानकारी actsofindia.in और lawstreet.co पर उपलब्ध कानूनी रिपोर्टों से।)

