खबर के 5 बड़े बिंदु
- ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट इंटरनेट मौलिक अधिकार को बच्चों के लिए भी सुनिश्चित कर गया — अनुच्छेद 21 और 19(1)(ए) के तहत।
- पूरी पाबंदी खारिज: बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर उम्र के नाम पर कंबल बैन लगाने से कोर्ट ने साफ इनकार किया।
- चाइल्ड मोड: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बच्चों के अकाउंट के लिए चाइल्ड मोड, प्राइवेट अकाउंट डिफॉल्ट और पैरेंटल कंसेंट सिस्टम लागू करने के निर्देश।
- सख्त कार्रवाई: CSEAM (बच्चों के यौन शोषण वाली सामग्री) के खिलाफ टर्नओवर से जुड़े जुर्माने और अवैध कमाई की वापसी (disgorgement) तक के सुझाव।
- अगली सुनवाई: केंद्र सरकार को 10 दिसंबर 2026 तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा।
फैसला क्या है
सुप्रीम कोर्ट इंटरनेट मौलिक अधिकार को लेकर अब कोई अस्पष्टता नहीं बची है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने 15 अक्टूबर को पारित और 17 अक्टूबर को जारी आदेश में कहा कि “इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल का अधिकार हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है” — और इसमें बच्चे भी शामिल हैं।
खंडपीठ ने कहा, “हम यह कहने में जरा भी नहीं झिझकते कि अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत इंटरनेट एक्सेस हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हमारे बच्चे, उम्र की परवाह किए बिना, वही अधिकार रखते हैं। इसे पूरी तरह नकारना उतना ही बेतुका है जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों में कोई अंतरात्मा नहीं है जिसे संरक्षित किया जाए, या कोई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है जिसे व्यक्त किया जाए।”
कोर्ट ने जोर दिया, “हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी आपस में विरोधी नहीं हैं। हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।”

किस मामले में आया यह फैसला
यह फैसला “जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश” (citation: 2026 INSC 1149) मामले में आया। दरअसल, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस (JRCA) ने कोर्ट में अर्जी दाखिल कर सितंबर 2024 के उस फैसले के अमल की मांग की थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज़ को संदिग्ध CSEAM (चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन एंड अब्यूज मटीरियल) अपराधों की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी सौंपी थी।
कोर्ट ने इस आदेश के साथ उन याचिकाओं से भी खुद को अलग किया जिनमें सोशल मीडिया अकाउंट के लिए न्यूनतम उम्र 18 साल तय करने की मांग की गई थी — वे याचिकाएं अभी लंबित हैं, और केंद्र सरकार ने कहा है कि वह IT नियमों में संशोधन करेगी।
क्यों खारिज हुई पूरी पाबंदी
कोर्ट ने कहा कि बच्चों की इंटरनेट सुरक्षा के नाम पर कंबल बैन (blanket ban) कोई सिद्ध समाधान नहीं है। ऐसा बैन बच्चों को बिना रेगुलेशन वाले खतरनाक प्लेटफॉर्मों की ओर धकेल सकता है, जहां माता-पिता या रेगुलेटर की नजर नहीं होती। यही नहीं, पाबंदी से बच्चे ऑनलाइन खतरा झेलने पर वयस्कों को बताने से डरेंगे — जिससे POCSO एक्ट का उद्देश्य ही कमजोर होगा।
साथ ही, कोर्ट ने कड़े एज वेरिफिकेशन के खतरे पर भी चेताया — लगातार संवेदनशील डेटा जमा करना बच्चों की निजता पर निगरानी और दुरुपयोग का बड़ा जोखिम पैदा करेगा।
कोर्ट ने क्या निर्देश दिए
1. चाइल्ड मोड: सोशल मीडिया अकाउंट्स में बच्चों (खासकर प्री-टीन) के लिए समर्पित चाइल्ड मोड, डिफॉल्ट प्राइवेट अकाउंट, अनजान वयस्कों के मैसेज पर रोक और नाबालिगों के लिए विज्ञापनों व कंटेंट का मॉडरेशन। 2. माता-पिता की भूमिका: पैरेंटल कंसेंट और निगरानी पर आधारित ढांचा; सटीक तौर-तरीके केंद्र सरकार को तय करने हैं। 3. प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी: CSEAM सामग्री की सक्रिय पहचान और हटाई के लिए मजबूत सिस्टम; गलत इंटरमीडियरीज़ पर उनके टर्नओवर से जुड़े अनुकरणीय जुर्माने और पे-वॉल/सब्सक्रिप्शन के पीछे छिपे CSEAM से हुई कमाई की वसूली के सुझाव। 4. स्कूलों में शिक्षा: एनसीईआरटी और SCERTs के साथ आयु-अनुकूल डिजिटल सेफ्टी शिक्षा को कोर करिकुलम में शामिल किया जाए; हर स्कूल में चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 प्रदर्शित हो। 5. केंद्र को आदेश: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय और विधि मंत्रालय को दिशानिर्देश, SOP और IT एक्ट/नियमों में संशोधन बनाने होंगे; 10 दिसंबर 2026 से पहले अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा।
इसका असर क्या होगा
यह फैसला उस बहस को संविधानिक आयाम दे देता है जो राज्यों में चल रही है — जैसे आंध्र प्रदेश में बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधों का प्रस्ताव। अब कोई भी उम्र-आधारित पाबंदी कोर्ट की इस कसौटी पर खरी उतरनी होगी: सुरक्षा का लक्ष्य हासिल हो, लेकिन मौलिक अधिकार का खात्मा न हो। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी अब बच्चों पर नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म्स, रेगुलेटर्स और कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर है।
स्रोत: Bar and Bench | LawTrend
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