भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट पोर्ट कंपनी अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (APSEZ) ने यूरोप में एक बड़ा दांव खेला है। कंपनी ने गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को ऐलान किया कि वह नीदरलैंड्स की Evos B.V. को खरीदने जा रही है। Adani Ports Evos deal की एंटरप्राइज़ वैल्यू €2.56 अरब (करीब ₹27,142 करोड़) तय हुई है। यह भारतीय पोर्ट सेक्टर की यूरोप में अब तक की सबसे बड़ी खरीदारी में से एक मानी जा रही है।
Evos यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी स्वतंत्र लिक्विड स्टोरेज कंपनी है। यानी तेल, केमिकल और दूसरे तरल पदार्थों को बड़े टैंकों में स्टोर करने का कारोबार। इस डील के बाद अडानी पोर्ट्स का कारोबार यूरोप के पांच देशों के बड़े एनर्जी और इंडस्ट्रियल हब तक फैल जाएगा।
Adani Ports Evos deal की 5 बड़ी बातें
- कीमत: एंटरप्राइज़ वैल्यू €2.56 अरब (करीब ₹27,142 करोड़); इक्विटी वैल्यू €1.18 अरब (करीब ₹12,511 करोड़)।
- क्या मिलेगा: Evos के 8 पोर्ट टर्मिनल — नीदरलैंड्स, जर्मनी, स्पेन, बेल्जियम और माल्टा में, कुल 63 लाख घन मीटर स्टोरेज क्षमता।
- कमाई: Evos ने 2025 में €392 मिलियन (करीब ₹4,150 करोड़) का रेवेन्यू और €219 मिलियन का EBITDA कमाया — यानी करीब 56% का मार्जिन।
- पैसा कहां से: डील पूरी तरह कर्ज़ से फंड होगी; जापानी बैंक MUFG ने €2.8 अरब तक की फाइनेंसिंग का कमिटमेंट दिया है।
- कब पूरी होगी: समझौते के 15 महीने के अंदर, यानी फरवरी 2028 तक — लेकिन पहले भारत और यूरोप में रेगुलेटरी मंज़ूरियां और वर्क्स काउंसिल से सलाह-मशविरा ज़रूरी है।
Evos आखिर है क्या?
Evos कोई छोटी कंपनी नहीं है। उसके टर्मिनल यूरोप के बड़े बंदरगाहों पर हैं, जहां कच्चा तेल, पेट्रोलियम प्रोडक्ट, केमिकल और बायोफ्यूल जैसे तरल पदार्थ स्टोर किए जाते हैं। कंपनी की खासियत यह है कि उसके टर्मिनलों की औसत ऑक्यूपेंसी करीब 99% रहती है — मतलब लगभग हर टैंक किराए पर चढ़ा रहता है। यही वजह है कि इसका मार्जिन 56% जैसा ऊंचा है।
अडानी पोर्ट्स ने यह डील एक कॉम्पिटिटिव बिडिंग प्रोसेस के ज़रिए जीती है। कंपनी ने Evos की कीमत उसके 2025 के EBITDA के 11.7 गुना पर आंकी है।
भारत के लिए इस डील का क्या मतलब है?
पहला, यह भारतीय कंपनियों के ग्लोबल विस्तार की कहानी का नया अध्याय है। डील पूरी होने के बाद अडानी पोर्ट्स का पोर्टफोलियो 20 से बढ़कर 28 पोर्ट और टर्मिनल का हो जाएगा, जो 10 देशों में फैले होंगे।
दूसरा, यह डील भारत की एनर्जी सिक्योरिटी से भी जुड़ती है। यूरोप में लिक्विड स्टोरेज का नेटवर्क होने का मतलब है कि भारतीय कंपनियां ग्लोबल एनर्जी ट्रेड में ज़्यादा मज़बूत स्थिति में होंगी।
तीसरा, यह भारत-अमेरिका ट्रेड डील की खबरों के साथ-साथ भारत के बढ़ते ग्लोबल फुटप्रिंट को दिखाता है। भारतीय कंपनियां अब सिर्फ घरेलू बाज़ार तक सीमित नहीं रहीं।
निवेशकों के लिए क्या संकेत है?
डील पूरी तरह कर्ज़ से फंड हो रही है, इसलिए निवेशकों की नज़र कंपनी के कर्ज़ पर रहेगी। अडानी पोर्ट्स के मुताबिक, डील के बाद उसका प्रॉ-फॉर्मा नेट डेट-टू-EBITDA रेशियो 2.76 गुना रहेगा, जो वित्त वर्ष 2027 तक घटकर 2.5 गुना होने की उम्मीद है।
एक अहम बात यह भी है कि डील अभी सिर्फ समझौता है, पूरी खरीदारी नहीं। जब तक रेगुलेटरी मंज़ूरियां नहीं मिलतीं, Evos अडानी पोर्ट्स की कमाई में शामिल नहीं होगी। इसलिए निवेशकों को 15 महीने की टाइमलाइन पर नज़र रखनी होगी।
कुल मिलाकर, यह डील अडानी पोर्ट्स को एक भारतीय पोर्ट कंपनी से ग्लोबल लॉजिस्टिक्स खिलाड़ी बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। अगर मंज़ूरियां समय पर मिलती हैं, तो 2028 की शुरुआत तक भारत की यह कंपनी यूरोप के एनर्जी हब में एक अहम नाम बन चुकी होगी।

स्रोत: The Hindu BusinessLine, Upstox, APSEZ का स्टॉक एक्सचेंज फाइलिंग।

