
क्या हुआ आज कोर्ट में?
27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर सुनवाई हुई। इस एसोसिएशन में 21 बड़े प्रकाशक शामिल हैं, जिनमें Network18, NDTV, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे नाम बताए गए हैं। याचिका में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून और उसके नियमों की कुछ धाराओं को चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान एसोसिएशन की वकील माधवी गोराडिया दीवान ने अदालत से कहा कि अगर पत्रकारों को खबर लिखने से पहले संबंधित व्यक्ति से सहमति लेनी पड़ी, तो खबर का पूरा मतलब ही बदल जाएगा। उनकी दलील थी कि ऐसी व्यवस्था में न्यूज़रूम बंद होने की नौबत आ सकती है, क्योंकि यह एक तरह की पूर्व-सेंसरशिप बन जाएगी। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, लेकिन फिलहाल कानून पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होने की जानकारी सामने आई है।
प्रकाशकों की तीन बड़ी आपत्तियां
1. सहमति की शर्त: प्रकाशकों का कहना है कि अगर किसी जांच के विषय को पहले से सूचित करके उसकी अनुमति लेनी पड़ी, तो वह व्यक्ति सबूत नष्ट कर सकता है या खबर को रोकने की कोशिश कर सकता है।
2. सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने का अधिकार: याचिका में कहा गया है कि कानून में सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने की मांग का अधिकार है, लेकिन उसमें जनहित की सुरक्षा का पर्याप्त प्रावधान नहीं है।
3. सरकार को डेटा देने की शक्ति: प्रकाशकों ने उस प्रावधान पर भी सवाल उठाया है, जिसके तहत राज्य संगठनों से व्यक्तिगत डेटा मांग सकता है। उनका कहना है कि पत्रकारिता के लिए लिखित छूट के बिना यह शक्ति गोपनीय सूत्रों को उजागर कर सकती है।
सरकार का पक्ष क्या है?
दूसरी तरफ, सरकार का रुख यह रहा है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करती है। अगस्त में हुई एक बैठक में मीडिया कंपनियों को यह भरोसा दिया गया था कि कानून प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। लेकिन प्रकाशकों का कहना है कि मौखिक आश्वासन काफी नहीं है — उन्हें यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर की तरह पत्रकारों के लिए लिखित छूट चाहिए। विवादित प्रावधानों में से कई मई 2027 से लागू होने की तैयारी में हैं।
आम पाठक के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर आप नियमित रूप से खबरें पढ़ते हैं, तो इस मामले का नतीजा आप तक पहुंचने वाली जानकारी की गति और गहराई को प्रभावित कर सकता है। जांचपरक खबरें अक्सर ऐसे सूत्रों पर टिकी होती हैं जो नाम नहीं बताना चाहते। अगर सूत्रों की सुरक्षा कमजोर हुई, तो ऐसी खबरें कम हो सकती हैं। दूसरी तरफ, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा भी एक जायज़ चिंता है। अदालत के सामने यही संतुलन साधने की चुनौती है। फिलहाल मामला शुरुआती चरण में है। 17 नवंबर की सुनवाई में केंद्र का जवाब और आगे की दलीलें इस बहस को और स्पष्ट करेंगी।
स्रोत: रॉयटर्स की अदालत-रिपोर्टिंग और मामले की सार्वजनिक जानकारी के आधार पर। यह खबर कानूनी कार्यवाही की रिपोर्ट है, अंतिम फैसला अदालत का होगा।
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