दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन यानी DUSU के चुनाव में शनिवार को जो तस्वीर उभर रही है, वह शुरुआती अनुमानों से थोड़ी अलग निकली है। जिस मुकाबले को ज्यादातर लोग सीधे ABVP बनाम NSUI की जंग मानकर चल रहे थे, उसमें एक निर्दलीय उम्मीदवार ने ऐसी बढ़त बना ली है कि पूरे कैंपस की चर्चा उसी के इर्द-गिर्द घूम रही है।
नॉर्थ कैंपस स्थित यूनिवर्सिटी स्पोर्ट्स स्टेडियम के मल्टीपर्पज हॉल में सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू हुई थी। शुक्रवार को हुए मतदान में इस बार 40.46 प्रतिशत वोटिंग दर्ज हुई, जो पिछले तीन वर्षों में सबसे ज्यादा है। पिछले साल यह आंकड़ा 39.5 प्रतिशत था।
अध्यक्ष पद पर कांटे की टक्कर
अध्यक्ष पद की लड़ाई पूरे दिन उतार-चढ़ाव भरी रही। शुरुआती राउंड में ABVP के यश डाबस आगे थे, लेकिन दूसरे राउंड में NSUI के विजय शंकर मीना ने बढ़त बना ली। इसके बाद कई राउंड तक दोनों उम्मीदवारों के बीच लीड बदलती रही। 11वें राउंड तक मीना, डाबस से 647 वोटों से आगे थे, लेकिन 13वें राउंड में डाबस ने दोबारा बढ़त हासिल कर ली। 16वें राउंड की गिनती पूरी होने तक यश डाबस को 18,786 वोट मिल चुके थे, जबकि विजय शंकर मीना 18,707 वोटों के साथ बेहद करीब बने हुए थे। यानी दोनों के बीच फासला महज कुछ सौ वोटों का रह गया है, जिससे यह साफ है कि अंतिम नतीजा आखिरी राउंड तक बदल सकता है।
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उपाध्यक्ष पद पर सबसे बड़ा उलटफेर
चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू उपाध्यक्ष पद की लड़ाई रही। इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने शुरुआत से ही ऐसी बढ़त बनाई कि किसी बड़े छात्र संगठन के लिए मुकाबले में टिकना मुश्किल हो गया। 16वें राउंड तक शौकीन को 24,943 वोट मिल चुके थे, जबकि ABVP के ईशु मौर्या 12,739 वोटों पर और NSUI के वीर छत्रथ महज 3,496 वोटों पर सिमटे नजर आए। यानी शौकीन अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से भी दोगुने से ज्यादा वोटों से आगे हैं।
Navbharat Times की रिपोर्ट के मुताबिक दीपांशु शौकीन के पिता चाहते थे कि उनका बेटा UPSC की तैयारी करे, लेकिन दीपांशु ने छात्र राजनीति का रास्ता चुना। किसी बड़े संगठन के झंडे के बिना निर्दलीय लड़कर इतनी बड़ी बढ़त बनाना उन्हें इस चुनाव का सबसे उल्लेखनीय नाम बना चुका है। अपनी बढ़त पर प्रतिक्रिया देते हुए शौकीन ने सोशल मीडिया पर सिर्फ इतना लिखा, “निःशब्द हूं।”
सचिव और संयुक्त सचिव पद का हाल
सचिव पद पर ABVP की रिया छावड़ी लगातार मजबूत स्थिति में रही हैं। 16वें राउंड तक उन्हें 16,145 वोट मिल चुके थे, जबकि NSUI की नम्रता चौधरी 12,223 वोटों के साथ पीछे चल रही थीं। संयुक्त सचिव पद की लड़ाई सबसे उलझी हुई साबित हो रही है। इस सीट पर NSUI के गोपाल चौधरी 12,647 वोटों के साथ आगे हैं, लेकिन समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव 12,638 वोटों के साथ बेहद करीब से पीछा कर रहे हैं। ABVP के लक्ष्य राज सिंह भी इस मुकाबले में पीछे नहीं हैं।
पिछले साल के मुकाबले क्या बदला
2025 के DUSU चुनाव में ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव, तीनों पद जीते थे, जबकि उपाध्यक्ष पद NSUI के हिस्से आया था। इस बार भी शुरुआती रुझान कुछ वैसी ही तस्वीर की तरफ इशारा कर रहे हैं, जिसमें ABVP तीन पदों पर मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। लेकिन इस बार का सबसे बड़ा फर्क यह है कि उपाध्यक्ष पद पर NSUI नहीं, बल्कि एक निर्दलीय उम्मीदवार ने बाजी मारने की तरफ कदम बढ़ाए हैं, जो पिछले कुछ वर्षों के चुनावी पैटर्न से अलग है।
DUSU की अहमियत क्यों इतनी बड़ी मानी जाती है
करीब 7 लाख छात्रों और 91 कॉलेजों वाली DUSU को दुनिया की सबसे बड़ी छात्र संस्था माना जाता है। इसकी स्थापना 1949 में हुई थी, हालांकि इसका प्रस्ताव आजादी से ठीक पहले, 6 अगस्त 1947 को ही रखा गया था, जब यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने इस संगठन के शुरुआती खर्च के लिए महज ₹150 का अनुदान देने पर सहमति जताई थी। आठ दशकों के इस सफर में DUSU ने अरुण जेटली, अजय माकन और रेखा गुप्ता जैसे कई ऐसे चेहरे दिए हैं, जो आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बने। यही वजह है कि हर साल होने वाला यह चुनाव सिर्फ कैंपस पॉलिटिक्स तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों की छात्र इकाइयों की ताकत परखने के मौके के तौर पर भी देखा जाता है।
आगे क्या
गिनती अभी पूरी नहीं हुई है और आखिरी राउंड की घोषणा का इंतजार किया जा रहा है। अध्यक्ष पद पर जिस तरह से बढ़त बार-बार बदली है, उसे देखते हुए अंतिम नतीजे तक कोई भी दावा जल्दबाजी होगी। हालांकि उपाध्यक्ष पद पर दीपांशु शौकीन की बढ़त इतनी बड़ी है कि जब तक कोई असाधारण उलटफेर न हो, उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। पूरे नतीजे की आधिकारिक घोषणा गिनती खत्म होने के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन की तरफ से की जाएगी।